जब चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर एक Tiger बैठा था – टी एन शेषन
1990 की ठंडी दिसंबर सुबह, देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त ने पहला फरमान सुनाया – “मैं भारत सरकार का मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं हूँ, मैं भारत का मुख्य चुनाव आयुक्त हूँ।”
लिफाफों से Government of India मिटवा दिया गया। आचार संहिता जो कागजों में सोई थी, जाग उठी।
न शराब बँटेगी, न दीवारों पर नारे लिखे जाएँगे, न सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग होगा। जो उल्लंघन करेगा, चुनाव रद्द।
राजनीति ने कहा आप सीमा पार कर रहे हैं।
शेषन ने जवाब दिया – “मेरी सीमा संविधान है।”
वो अधिकारी जिसने लोकतंत्र को फिर से जीवित किया। आज के Vote Chor के दौर में उनकी बहुत याद आती है।
इतिहास कभी-कभी एक आदमी को चुनता है, ताकि बाकी सबको याद रहे कुर्सी कितनी भी बड़ी हो, संविधान उससे बड़ा होता है।

