सुप्रीम कोर्ट ने 22 साल से जेल में बंद एक ऐसे व्यक्ति को जेल से बरी करने का आदेश दिया जसे अदालत ने गलत आरोप में दोषी ठहरा दिया था।
22 साल बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले में व्यक्ति निर्दोष निकला। इस मामले में ट्रायल कोर्ट के सबूतों को ठीक से नहीं परखा गया था और हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने में देरी के तकनीकी आधार पर उसकी सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसके चलते उसे 10 साल और जेल में बिताने पड़े।
यह एक ऐसा मामला है जो दिखाता है कि कैसे न्याय के लिए लड़ रहे एक गरीब व्यक्ति को खुद न्यायपालिका से ही निराशा हाथ लगती है, जब कोर्ट तकनीकी आधार पर सुनवाई करने से इनकार कर देता है। जब उस गरीब दोषी व्यक्ति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब तक वह पहले ही 12 साल जेल में बिता चुका था। हाई कोर्ट ने अपील दाखिल करने में देरी के तकनीकी आधार पर उसकी सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिससे उसे 10 साल और जेल में बिताने पड़े। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी किया और यह माना कि हमारे समाज के पिछड़े वर्गों, और खासकर उनमें से दोषी ठहराए गए और जेल में बंद लोगों के लिए न्याय पाना अब भी मुश्किल है।

