ब्रह्मचारी आत्मबोधनंद जी का वर्तमान सत्याग्रह जिला एवं सत्र न्यायाधीश हरिद्वार श्री नरेंद्र दत्त के गंभीर आचरण के विरोध में है। आज 14 वा दिन


स्थान: मातृ सदन, हरिद्वार।

हरिद्वार स्थित मातृ सदन के संन्यासी ब्रह्मचारी आत्मबोधनंद जी का न्याय, सत्य और संस्थागत शुचिता की रक्षा के लिए चल रहे अनवरत सत्याग्रह/अनशन को आज 14 दिन हो चुके हैं। यह अविछिन्न अनशन न्यायपालिका की गरिमा और जनता के विश्वास को बचाने के लिए उठी एक गंभीर चेतावनी है।

मातृ सदन एक आध्यात्मिक एवं सामाजिक-पर्यावरणीय संस्था है, जिसकी स्थापना पूज्य श्री गुरुदेव स्वामी श्री शिवानंद जी महाराज ने की थी। यह संस्था वर्षों से गंगा की अविरलता, पर्यावरण संरक्षण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अहिंसात्मक संघर्ष के लिए जानी जाती है। मातृ सदन के संन्यासियों ने सत्य और जनहित के लिए अनेक बार कठोर उपवास और सत्याग्रह किए हैं।

ब्रह्मचारी आत्मबोधनंद जी का वर्तमान सत्याग्रह जिला एवं सत्र न्यायाधीश हरिद्वार श्री नरेंद्र दत्त के गंभीर आचरण के विरोध में है। 18-02-2026 को पारित एक न्यायिक आदेश में, जो कि मातृ सदन से पूर्णतः असंबंधित एक अग्रिम जमानत प्रकरण से संबंधित था, श्री नरेंद्र दत्त ने बिना किसी आधार, बिना मातृ सदन के किसी पक्षकार की दलील और बिना सुनवाई का अवसर दिए मातृ सदन के विरुद्ध अत्यंत अपमानजनक और निराधार टिप्पणियाँ दर्ज कर दीं जिसमें ब्लैकमेलिंग और दुराचार जैसे गंभीर आरोप मढ़े गए। संतों के संत होने पर भी प्रश्न उठाए गए। यह न्यायिक मर्यादा, प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के मूल सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।

और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि श्री नरेंद्र दत्त के पूरे कार्यकाल में एक चौंकाने वाला और खतरनाक पैटर्न बार-बार सामने आता रहा है —

गुमनाम शिकायत → संदिग्ध/फर्जी जांच → अपने आंतरिक द्वेष में अपने ही अधिकारियों के निलंबन या दंडस्वरूप निष्कासित करने की कठोर कार्रवाई।

श्री नरेंद्र दत्त के रेजिस्ट्रार रहने के दौरान ऐसे कम से कम 9 मामलों में यही पैटर्न सामने आया है, जिनमें न्यायिक अधिकारियों के जीवन और करियर को गंभीर क्षति पहुंचाई गई।

सबसे चर्चित मामलों में 2023 का जिला जज श्री धनंजय चतुर्वेदी का मामला है, जहाँ एक कथित “गुमनाम शिकायत” के आधार पर कार्रवाई की गई और उन्हें निलंबित किया गया, जिसे बाद में उच्च न्यायालय ने संदिग्ध और निराधार पाया।

इसी प्रकार 2020 में सिविल जज दीपाली शर्मा के मामले में भी एक कथित जांच और छापे की कार्रवाई के आधार पर उन्हें वर्षों तक निलंबित रखा गया। इसके पीछे भी मुख्य रूप से श्री नरेंद्र दत्त का ही नाम सामने आया। लगभग छह वर्ष बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने विस्तृत 130 पृष्ठों के निर्णय में उन्हें पूर्णतः निर्दोष घोषित किया और पूरा घटनाक्रम एक गंभीर साजिश और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का उदाहरण बनकर सामने आया।

इसी तरह श्री नरेंद्र दत्त के 2010-2018 के उनके रेजिस्ट्रार पद पर रहने के दौरान अन्य कई मामलों में भी अनाम शिकायतों और संदिग्ध जांचों के आधार पर न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। उनके न्यायिक सचिव रहने के दौरान एक गंभीर अपराध के अपराधियों के विरुद्ध हाई कोर्ट में अपील की संस्तुति न देने का भी आरोप सामने आया, जिसपर माननीय उच्च न्यायालय ने आदेश भी पारित किया जिसमें श्री नरेंद्र दत्त को न्यायिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया गया और ये आदेश श्री नरेंद्र दत्त के सर्विस रिकार्ड में भी दर्ज करवाया गया । उनके क्रियाकलापों और इन घटनाओं ने न्यायपालिका की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

यह अत्यंत गंभीर संवैधानिक प्रश्न है कि जिस अधिकारी के कार्यकाल से बार-बार ऐसी प्रतिशोधात्मक घटनाएँ जुड़ी रही हों, वह न्याय की कुर्सी पर बैठकर निष्पक्ष न्याय कैसे दे सकता है?

मातृ सदन का मानना है कि न्यायपालिका लोकतंत्र की अंतिम आशा है। यदि उसी संस्था के भीतर ऐसे गंभीर आरोप और आचरण सामने आते हैं और ऐसे अधिकारी को तत्काल रूप से निलंबित कर उन पर समय रहते कार्रवाई नहीं होती, तो न्याय का ह्रास होना और जनता का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।

इसीलिए ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद जी पिछले 14 दिनों से निरंतर अनशन पर हैं और उनकी मांगें स्पष्ट हैं—

  1. श्री नरेंद्र दत्त के न्यायिक आचरण की स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच हो।
  2. जांच पूरी होने तक उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए।
  3. उनके कार्यकाल में अनाम शिकायतों के आधार पर हुई सभी जांचों और कार्रवाईयों की पुनः समीक्षा की जाए। उनके द्वारा की गई सभी जाँचों को सार्वजनिक किया जाए।
  4. मातृ सदन के विरुद्ध की गई अपमानजनक टिप्पणियों के लिए लिखित, बिना शर्त क्षमा-याचना की जाए।

यदि न्यायपालिका की गरिमा और जनता के विश्वास को बचाना है, तो इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच अब टाली नहीं जा सकती।

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