हरिद्वार। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व, राष्ट्रसेवा, सुशासन तथा लोककल्याण को समर्पित सफल 12 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पूर्ण होने के पावन अवसर पर भारत की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता एवं राष्ट्रीय पुनर्जागरण को रेखांकित करते हुए एक विशेष संदेश जारी किया गया है।
”भारत का वर्तमान कालखण्ड आत्मनिर्भरता, आत्मगौरव और सनातन सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का स्वर्णिम अध्याय” — जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी
हरिद्वार। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व, राष्ट्रसेवा, सुशासन तथा लोककल्याण को समर्पित सफल 12 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पूर्ण होने के पावन अवसर पर भारत की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता एवं राष्ट्रीय पुनर्जागरण को रेखांकित करते हुए एक विशेष संदेश जारी किया गया है।
”भारत का वर्तमान कालखण्ड आत्मनिर्भरता, आत्मगौरव और सनातन सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का स्वर्णिम अध्याय” — जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि
भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, अपितु सनातन सांस्कृतिक चेतना, जीवन्त सभ्यता और सहस्राब्दियों से अविरल प्रवाहित आध्यात्मिक परम्परा का पुण्यनाम है। यह वह भूमि है, जहाँ शासन को केवल सत्ता का साधन नहीं, बल्कि लोकमंगल, धर्म, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा का माध्यम माना गया है। जब-जब भारत ने अपने इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर स्वयं को नूतन रूप में प्रतिष्ठित किया है, तब-तब उसे ऐसे नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ है, जिसने केवल प्रशासन नहीं किया, बल्कि राष्ट्रजीवन में नवचेतना, नवविश्वास और नवसंकल्प का संचार किया है।
वर्तमान युग में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी का नेतृत्व इसी राष्ट्रीय पुनर्जागरण का एक महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायी अध्याय बनकर उभरा है। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र भारतवर्ष को पुनः तीसरी बार ऐसे प्रधानमंत्री का नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिनके व्यक्तित्व में शील, संकल्प, सेवा, साधना और समर्पण का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि राष्ट्र के सांस्कृतिक आत्मबोध, विकास-दृष्टि और वैश्विक प्रतिष्ठा के समर्थ संवाहक के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं।
भारतीय परम्परा में आदर्श नेतृत्व की परिकल्पना सदैव “राजर्षि” के रूप में की गई है – ऐसा नेतृत्व जो प्रशासनिक दक्षता के साथ नैतिकता, आध्यात्मिकता और लोकमंगल के प्रति समर्पित हो। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व में शासक, प्रशासक और उपासक – इन तीनों आयामों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। उनकी कार्यशैली में अनुशासन है, दृष्टि में दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित है और संकल्पों में जनकल्याण का पवित्र भाव निहित है। इसी कारण उनके नेतृत्व में शासन केवल सत्ता-संचालन का माध्यम न रहकर राष्ट्र-निर्माण का व्यापक अभियान बन गया है।
इतिहास साक्षी है कि सम्राट विक्रमादित्य, महाराज हर्षवर्धन तथा लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसे लोकनायक शासकों ने भारत की सांस्कृतिक चेतना, धर्मसम्मत शासन और जनकल्याणकारी दृष्टिकोण को सुदृढ़ किया था। आधुनिक भारत में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी उसी गौरवशाली परम्परा के समकालीन संवाहक प्रतीत होते हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को नवीन आत्मविश्वास के साथ अभिव्यक्त किया है तथा विश्वपटल पर अपनी सभ्यतागत पहचान को अभूतपूर्व सम्मान के साथ स्थापित किया है।
पिछले बारह वर्षों में भारत ने विकास और जनकल्याण के ऐसे समन्वित मॉडल को साकार होते देखा है, जिसमें समाज के अन्तिम व्यक्ति तक सुविधाएँ पहुँचाने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। करोड़ों निर्धन परिवारों तक निःशुल्क खाद्यान्न की व्यवस्था, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के माध्यम से आवास, ‘आयुष्मान भारत’ जैसी स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाएँ, ‘उज्ज्वला योजना’ द्वारा स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता, ‘जल जीवन मिशन’ के माध्यम से घर-घर जल पहुँचाने का अभियान तथा वित्तीय समावेशन हेतु जनधन योजना जैसे प्रयासों ने करोड़ों नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है।
भारत की आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ है। आधुनिक रेलवे, वन्दे भारत ट्रेनों का विस्तार, नए हवाई अड्डों का निर्माण, एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का तीव्र विकास, बंदरगाहों का आधुनिकीकरण तथा डिजिटल अवसंरचना का व्यापक विस्तार – इन सभी ने भारत को एक नई गति और नई दिशा प्रदान की है। आज भारत डिजिटल भुगतान, डिजिटल पहचान और प्रौद्योगिकी आधारित जनसेवाओं के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत ने आत्मविश्वास और दृढ़ता का परिचय दिया है। सीमाओं की सुरक्षा, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, आधुनिक सैन्य क्षमताओं का विस्तार तथा आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट और दृढ़ नीति ने भारत की सुरक्षा-सामर्थ्य को नई शक्ति प्रदान की है। “आत्मनिर्भर भारत” का संकल्प केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति बनकर उभरा है।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दृष्टि से भी यह कालखण्ड ऐतिहासिक महत्व का है। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, महाकाल लोक का विस्तार, केदारनाथ धाम के पुनरोद्धार तथा भारत की आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक मंच पर सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित करने के अनेक प्रयास इस युग की विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं। इन प्रयासों ने करोड़ों भारतीयों के सांस्कृतिक आत्मविश्वास को नई ऊर्जा प्रदान की है।
वैश्विकस्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर वैश्विक कूटनीति के विभिन्न मंचों तक भारत की भूमिका अधिक प्रभावशाली हुई है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सनातन भारतीय भावना को वैश्विक संवाद का अंग बनाने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह केवल आर्थिक या कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की वैश्विक स्वीकार्यता का भी प्रतीक है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी की कार्यनिष्ठा, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण विशेष रूप से प्रेरणादायी है। भारतीय संस्कृति जिस “कर्मयोग” की शिक्षा देती है, उसका जीवन्त प्रतिबिम्ब उनके सार्वजनिक जीवन में दृष्टिगोचर होता है। जब नेतृत्व की नीयत निर्मल हो, लक्ष्य राष्ट्रहित हो और संकल्प लोकमंगल के लिए समर्पित हों, तब परिवर्तन केवल नीतियों में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मानस में भी दिखाई देता है।
निस्संदेह, वर्तमान काल भारत के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव के पुनर्जागरण का काल है। यह वह युग है, जिसमें भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और विकासोन्मुख दृष्टि के साथ विश्व समुदाय के समक्ष एक नई शक्ति के रूप में उदित हो रहा है।
4,399 दिनों की यह यात्रा सशक्त, समृद्ध, विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का स्वर्णिम अध्याय है। यह वह कालखण्ड है, जहाँ विकास भी है और विरासत भी; जहाँ कल्याण भी है और कीर्ति भी; जहाँ सामर्थ्य भी है और सम्मान भी। इसी अवधि में करोड़ों परिवारों के जीवन में आशा का प्रकाश पहुँचा, नारी शक्ति को नए अवसर प्राप्त हुए, युवाओं को नई संभावनाएँ मिलीं और अन्नदाता को सम्मान एवं सशक्तिकरण का नया आधार प्राप्त हुआ।
आज विकसित भारत के संकल्प की दिशा में अग्रसर राष्ट्र, आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व, निर्णायक नीतियों और “राष्ट्र प्रथम” की भावना का सशक्त प्रमाण है। यह यात्रा केवल शासन की सफलता की कथा नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सामूहिक पुरुषार्थ, विश्वास और नवसंकल्प की गाथा है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का हृदय से अभिनन्दन, साधुवाद एवं मंगलकामनाएँ। ईश्वर उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरन्तर राष्ट्रसेवा की शक्ति प्रदान करें, ताकि भारत अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विकास-दृष्टि के साथ विश्वकल्याण के पथ पर निरन्तर अग्रसर होता रहे।
(लेखक सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रसार के लिए आजीवन समर्पित, संख्या तथा परंपरा – दोनों ही दृष्टियों से विश्व के प्राचीनतम एवं विशालतम साधु-संगठन श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के प्रमुख हैं। वे हिन्दू धर्म के विविध मतों, पंथों एवं संप्रदायों की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था हिन्दू धर्म आचार्य सभा के अध्यक्ष होने के साथ-साथ विश्वविख्यात भारत माता मन्दिर तथा समन्वय सेवा ट्रस्ट के भी अध्यक्ष हैं। उनके नेतृत्व में आध्यात्मिक चेतना, राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों तथा लोककल्याण की विविध धाराएँ निरंतर प्रवाहित हो रही हैं।)
भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, अपितु सनातन सांस्कृतिक चेतना, जीवन्त सभ्यता और सहस्राब्दियों से अविरल प्रवाहित आध्यात्मिक परम्परा का पुण्यनाम है। यह वह भूमि है, जहाँ शासन को केवल सत्ता का साधन नहीं, बल्कि लोकमंगल, धर्म, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा का माध्यम माना गया है। जब-जब भारत ने अपने इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर स्वयं को नूतन रूप में प्रतिष्ठित किया है, तब-तब उसे ऐसे नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ है, जिसने केवल प्रशासन नहीं किया, बल्कि राष्ट्रजीवन में नवचेतना, नवविश्वास और नवसंकल्प का संचार किया है।
वर्तमान युग में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी का नेतृत्व इसी राष्ट्रीय पुनर्जागरण का एक महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायी अध्याय बनकर उभरा है। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र भारतवर्ष को पुनः तीसरी बार ऐसे प्रधानमंत्री का नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिनके व्यक्तित्व में शील, संकल्प, सेवा, साधना और समर्पण का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि राष्ट्र के सांस्कृतिक आत्मबोध, विकास-दृष्टि और वैश्विक प्रतिष्ठा के समर्थ संवाहक के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं।
”भारत का वर्तमान कालखण्ड आत्मनिर्भरता, आत्मगौरव और सनातन सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का स्वर्णिम अध्याय” — जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि
भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, अपितु सनातन सांस्कृतिक चेतना, जीवन्त सभ्यता और सहस्राब्दियों से अविरल प्रवाहित आध्यात्मिक परम्परा का पुण्यनाम है। यह वह भूमि है, जहाँ शासन को केवल सत्ता का साधन नहीं, बल्कि लोकमंगल, धर्म, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा का माध्यम माना गया है। जब-जब भारत ने अपने इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर स्वयं को नूतन रूप में प्रतिष्ठित किया है, तब-तब उसे ऐसे नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ है, जिसने केवल प्रशासन नहीं किया, बल्कि राष्ट्रजीवन में नवचेतना, नवविश्वास और नवसंकल्प का संचार किया है।
वर्तमान युग में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी का नेतृत्व इसी राष्ट्रीय पुनर्जागरण का एक महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायी अध्याय बनकर उभरा है। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र भारतवर्ष को पुनः तीसरी बार ऐसे प्रधानमंत्री का नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिनके व्यक्तित्व में शील, संकल्प, सेवा, साधना और समर्पण का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि राष्ट्र के सांस्कृतिक आत्मबोध, विकास-दृष्टि और वैश्विक प्रतिष्ठा के समर्थ संवाहक के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं।
भारतीय परम्परा में आदर्श नेतृत्व की परिकल्पना सदैव “राजर्षि” के रूप में की गई है – ऐसा नेतृत्व जो प्रशासनिक दक्षता के साथ नैतिकता, आध्यात्मिकता और लोकमंगल के प्रति समर्पित हो। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व में शासक, प्रशासक और उपासक – इन तीनों आयामों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। उनकी कार्यशैली में अनुशासन है, दृष्टि में दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित है और संकल्पों में जनकल्याण का पवित्र भाव निहित है। इसी कारण उनके नेतृत्व में शासन केवल सत्ता-संचालन का माध्यम न रहकर राष्ट्र-निर्माण का व्यापक अभियान बन गया है।
इतिहास साक्षी है कि सम्राट विक्रमादित्य, महाराज हर्षवर्धन तथा लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसे लोकनायक शासकों ने भारत की सांस्कृतिक चेतना, धर्मसम्मत शासन और जनकल्याणकारी दृष्टिकोण को सुदृढ़ किया था। आधुनिक भारत में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी उसी गौरवशाली परम्परा के समकालीन संवाहक प्रतीत होते हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को नवीन आत्मविश्वास के साथ अभिव्यक्त किया है तथा विश्वपटल पर अपनी सभ्यतागत पहचान को अभूतपूर्व सम्मान के साथ स्थापित किया है।
पिछले बारह वर्षों में भारत ने विकास और जनकल्याण के ऐसे समन्वित मॉडल को साकार होते देखा है, जिसमें समाज के अन्तिम व्यक्ति तक सुविधाएँ पहुँचाने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। करोड़ों निर्धन परिवारों तक निःशुल्क खाद्यान्न की व्यवस्था, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के माध्यम से आवास, ‘आयुष्मान भारत’ जैसी स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाएँ, ‘उज्ज्वला योजना’ द्वारा स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता, ‘जल जीवन मिशन’ के माध्यम से घर-घर जल पहुँचाने का अभियान तथा वित्तीय समावेशन हेतु जनधन योजना जैसे प्रयासों ने करोड़ों नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है।
भारत की आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ है। आधुनिक रेलवे, वन्दे भारत ट्रेनों का विस्तार, नए हवाई अड्डों का निर्माण, एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का तीव्र विकास, बंदरगाहों का आधुनिकीकरण तथा डिजिटल अवसंरचना का व्यापक विस्तार – इन सभी ने भारत को एक नई गति और नई दिशा प्रदान की है। आज भारत डिजिटल भुगतान, डिजिटल पहचान और प्रौद्योगिकी आधारित जनसेवाओं के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत ने आत्मविश्वास और दृढ़ता का परिचय दिया है। सीमाओं की सुरक्षा, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, आधुनिक सैन्य क्षमताओं का विस्तार तथा आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट और दृढ़ नीति ने भारत की सुरक्षा-सामर्थ्य को नई शक्ति प्रदान की है। “आत्मनिर्भर भारत” का संकल्प केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति बनकर उभरा है।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दृष्टि से भी यह कालखण्ड ऐतिहासिक महत्व का है। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, महाकाल लोक का विस्तार, केदारनाथ धाम के पुनरोद्धार तथा भारत की आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक मंच पर सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित करने के अनेक प्रयास इस युग की विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं। इन प्रयासों ने करोड़ों भारतीयों के सांस्कृतिक आत्मविश्वास को नई ऊर्जा प्रदान की है।
वैश्विकस्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर वैश्विक कूटनीति के विभिन्न मंचों तक भारत की भूमिका अधिक प्रभावशाली हुई है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सनातन भारतीय भावना को वैश्विक संवाद का अंग बनाने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह केवल आर्थिक या कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की वैश्विक स्वीकार्यता का भी प्रतीक है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी की कार्यनिष्ठा, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण विशेष रूप से प्रेरणादायी है। भारतीय संस्कृति जिस “कर्मयोग” की शिक्षा देती है, उसका जीवन्त प्रतिबिम्ब उनके सार्वजनिक जीवन में दृष्टिगोचर होता है। जब नेतृत्व की नीयत निर्मल हो, लक्ष्य राष्ट्रहित हो और संकल्प लोकमंगल के लिए समर्पित हों, तब परिवर्तन केवल नीतियों में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मानस में भी दिखाई देता है।
निस्संदेह, वर्तमान काल भारत के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव के पुनर्जागरण का काल है। यह वह युग है, जिसमें भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और विकासोन्मुख दृष्टि के साथ विश्व समुदाय के समक्ष एक नई शक्ति के रूप में उदित हो रहा है।
4,399 दिनों की यह यात्रा सशक्त, समृद्ध, विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का स्वर्णिम अध्याय है। यह वह कालखण्ड है, जहाँ विकास भी है और विरासत भी; जहाँ कल्याण भी है और कीर्ति भी; जहाँ सामर्थ्य भी है और सम्मान भी। इसी अवधि में करोड़ों परिवारों के जीवन में आशा का प्रकाश पहुँचा, नारी शक्ति को नए अवसर प्राप्त हुए, युवाओं को नई संभावनाएँ मिलीं और अन्नदाता को सम्मान एवं सशक्तिकरण का नया आधार प्राप्त हुआ।
आज विकसित भारत के संकल्प की दिशा में अग्रसर राष्ट्र, आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व, निर्णायक नीतियों और “राष्ट्र प्रथम” की भावना का सशक्त प्रमाण है। यह यात्रा केवल शासन की सफलता की कथा नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सामूहिक पुरुषार्थ, विश्वास और नवसंकल्प की गाथा है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का हृदय से अभिनन्दन, साधुवाद एवं मंगलकामनाएँ। ईश्वर उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरन्तर राष्ट्रसेवा की शक्ति प्रदान करें, ताकि भारत अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विकास-दृष्टि के साथ विश्वकल्याण के पथ पर निरन्तर अग्रसर होता रहे।
(लेखक सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रसार के लिए आजीवन समर्पित, संख्या तथा परंपरा – दोनों ही दृष्टियों से विश्व के प्राचीनतम एवं विशालतम साधु-संगठन श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के प्रमुख हैं। वे हिन्दू धर्म के विविध मतों, पंथों एवं संप्रदायों की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था हिन्दू धर्म आचार्य सभा के अध्यक्ष होने के साथ-साथ विश्वविख्यात भारत माता मन्दिर तथा समन्वय सेवा ट्रस्ट के भी अध्यक्ष हैं। उनके नेतृत्व में आध्यात्मिक चेतना, राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों तथा लोककल्याण की विविध धाराएँ निरंतर प्रवाहित हो रही हैं।)
भारतीय परम्परा में आदर्श नेतृत्व की परिकल्पना सदैव “राजर्षि” के रूप में की गई है – ऐसा नेतृत्व जो प्रशासनिक दक्षता के साथ नैतिकता, आध्यात्मिकता और लोकमंगल के प्रति समर्पित हो। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व में शासक, प्रशासक और उपासक – इन तीनों आयामों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। उनकी कार्यशैली में अनुशासन है, दृष्टि में दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित है और संकल्पों में जनकल्याण का पवित्र भाव निहित है। इसी कारण उनके नेतृत्व में शासन केवल सत्ता-संचालन का माध्यम न रहकर राष्ट्र-निर्माण का व्यापक अभियान बन गया है।
इतिहास साक्षी है कि सम्राट विक्रमादित्य, महाराज हर्षवर्धन तथा लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसे लोकनायक शासकों ने भारत की सांस्कृतिक चेतना, धर्मसम्मत शासन और जनकल्याणकारी दृष्टिकोण को सुदृढ़ किया था। आधुनिक भारत में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी उसी गौरवशाली परम्परा के समकालीन संवाहक प्रतीत होते हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को नवीन आत्मविश्वास के साथ अभिव्यक्त किया है तथा विश्वपटल पर अपनी सभ्यतागत पहचान को अभूतपूर्व सम्मान के साथ स्थापित किया है।
पिछले बारह वर्षों में भारत ने विकास और जनकल्याण के ऐसे समन्वित मॉडल को साकार होते देखा है, जिसमें समाज के अन्तिम व्यक्ति तक सुविधाएँ पहुँचाने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। करोड़ों निर्धन परिवारों तक निःशुल्क खाद्यान्न की व्यवस्था, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के माध्यम से आवास, ‘आयुष्मान भारत’ जैसी स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाएँ, ‘उज्ज्वला योजना’ द्वारा स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता, ‘जल जीवन मिशन’ के माध्यम से घर-घर जल पहुँचाने का अभियान तथा वित्तीय समावेशन हेतु जनधन योजना जैसे प्रयासों ने करोड़ों नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है।
भारत की आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ है। आधुनिक रेलवे, वन्दे भारत ट्रेनों का विस्तार, नए हवाई अड्डों का निर्माण, एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का तीव्र विकास, बंदरगाहों का आधुनिकीकरण तथा डिजिटल अवसंरचना का व्यापक विस्तार – इन सभी ने भारत को एक नई गति और नई दिशा प्रदान की है। आज भारत डिजिटल भुगतान, डिजिटल पहचान और प्रौद्योगिकी आधारित जनसेवाओं के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत ने आत्मविश्वास और दृढ़ता का परिचय दिया है। सीमाओं की सुरक्षा, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, आधुनिक सैन्य क्षमताओं का विस्तार तथा आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट और दृढ़ नीति ने भारत की सुरक्षा-सामर्थ्य को नई शक्ति प्रदान की है। “आत्मनिर्भर भारत” का संकल्प केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति बनकर उभरा है।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दृष्टि से भी यह कालखण्ड ऐतिहासिक महत्व का है। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, महाकाल लोक का विस्तार, केदारनाथ धाम के पुनरोद्धार तथा भारत की आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक मंच पर सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित करने के अनेक प्रयास इस युग की विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं। इन प्रयासों ने करोड़ों भारतीयों के सांस्कृतिक आत्मविश्वास को नई ऊर्जा प्रदान की है।
वैश्विकस्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर वैश्विक कूटनीति के विभिन्न मंचों तक भारत की भूमिका अधिक प्रभावशाली हुई है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सनातन भारतीय भावना को वैश्विक संवाद का अंग बनाने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह केवल आर्थिक या कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की वैश्विक स्वीकार्यता का भी प्रतीक है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी की कार्यनिष्ठा, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण विशेष रूप से प्रेरणादायी है। भारतीय संस्कृति जिस “कर्मयोग” की शिक्षा देती है, उसका जीवन्त प्रतिबिम्ब उनके सार्वजनिक जीवन में दृष्टिगोचर होता है। जब नेतृत्व की नीयत निर्मल हो, लक्ष्य राष्ट्रहित हो और संकल्प लोकमंगल के लिए समर्पित हों, तब परिवर्तन केवल नीतियों में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मानस में भी दिखाई देता है।
निस्संदेह, वर्तमान काल भारत के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव के पुनर्जागरण का काल है। यह वह युग है, जिसमें भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और विकासोन्मुख दृष्टि के साथ विश्व समुदाय के समक्ष एक नई शक्ति के रूप में उदित हो रहा है।
4,399 दिनों की यह यात्रा सशक्त, समृद्ध, विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का स्वर्णिम अध्याय है। यह वह कालखण्ड है, जहाँ विकास भी है और विरासत भी; जहाँ कल्याण भी है और कीर्ति भी; जहाँ सामर्थ्य भी है और सम्मान भी। इसी अवधि में करोड़ों परिवारों के जीवन में आशा का प्रकाश पहुँचा, नारी शक्ति को नए अवसर प्राप्त हुए, युवाओं को नई संभावनाएँ मिलीं और अन्नदाता को सम्मान एवं सशक्तिकरण का नया आधार प्राप्त हुआ।
आज विकसित भारत के संकल्प की दिशा में अग्रसर राष्ट्र, आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व, निर्णायक नीतियों और “राष्ट्र प्रथम” की भावना का सशक्त प्रमाण है। यह यात्रा केवल शासन की सफलता की कथा नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सामूहिक पुरुषार्थ, विश्वास और नवसंकल्प की गाथा है

