श्रद्धा और समपर्ण : शिक्षा मंदिर की लॉबी में जीवंत हैं जननेता दिवाकर भट्ट की यादें

श्रद्धा और समपर्ण : शिक्षा मंदिर की लॉबी में जीवंत हैं जननेता दिवाकर भट्ट की यादें

उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित शिक्षा मंदिर तरुण हिमालय इंटर कॉलेज की लॉबी में हर सुबह एक भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिलता है।

विद्यालय की लॉबी में राज्य आंदोलन के महानायक, पूर्व कैबिनेट मंत्री और इस संस्थान के संस्थापक स्वर्गीय दिवाकर भट्ट जी की एक भव्य तस्वीर लगी है।

इस तस्वीर के सामने हर दिन एक व्यक्ति पूरी श्रद्धा के साथ सिर झुकाता है और ताजे फूल अर्पित करता है। यह सिलसिला तब से अनवरत जारी है जब से यह तस्वीर यहां स्थापित हुई है।

अंतिम समय के सारथी:-
कमल सिंह राणा रोजाना फूल चढ़ाने वाले यह व्यक्ति कोई साधारण कर्मचारी नहीं, बल्कि स्वर्गीय #दिवाकरभट्ट जी के सबसे वफादार अनुसेवक रहे हैं।

कमल सिंह राणा ने दिवाकर भट्ट जी के साथ उनके अंतिम समय तक साये की तरह काम किया।

उन्होंने #फील्डमार्शल के संघर्षों, उनकी जन-कल्याणकारी सोच और शिक्षा के प्रति उनके विजन को बहुत करीब से देखा है। आज जब दिवाकर भट्ट जी हमारे बीच नहीं हैं, तब भी कमल सिंह राणा विद्यालय के परम हितैशी और अनुशासक के रूप में उनकी स्मृतियों व विरासत संरक्षित रखने के लिए निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनकी यह दैनिक क्रिया केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपने गुरु और मार्गदर्शक के प्रति कभी न खत्म होने वाली वफादारी और सम्मान का प्रतीक है।
‘फील्ड मार्शल’ का शिक्षा का विजन:-
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में अपनी आक्रामक और कुशल रणनीति के कारण दिवाकर भट्ट जी को लोग आदर से ‘फील्ड मार्शल’ कहते थे। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई के साथ-साथ उनका एक और बड़ा सपना था—पहाड़ और आस-पास के बच्चों को उत्कृष्ट शिक्षा देना। इसी दूरगामी सोच के साथ उन्होंने ‘शिक्षा मंदिर तरुण हिमालय इंटर कॉलेज’ की स्थापना की थी। वह जानते थे कि एक सशक्त समाज का निर्माण केवल बंदूक या नारों से नहीं, बल्कि ज्ञान की कलम से ही संभव है।

जीवंत है यादें और विरासत:-
कमल सिंह राणा द्वारा रोज सुबह तस्वीर पर फूल चढ़ाना विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के लिए भी एक मूक संदेश है। यह दृश्य हर आने-जाने वाले को याद दिलाता है कि जिस संस्थान में वे पढ़ रहे हैं या काम कर रहे हैं, उसकी नींव में कितनी बड़ी शख्सियत का पसीना और संकल्प छुपा है। दिवाकर भट्ट जी भले ही भौतिक रूप से चले गए हों, लेकिन कमल सिंह राणा के इस निस्वार्थ समर्पण और स्कूल के अनुशासित माहौल में उनकी आत्मा आज भी इस लॉबी में मुस्कुराती हुई महसूस होती है

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