विचारों से राजनीति गढ़ने वाला वो नाम, जिसने सत्ता से ज्यादा सिद्धांतों को महत्व दिया – मुरली मनोहर…
जोशी सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक वैचारिक धरोहर हैं। उनकी राजनीति में ज्ञान, राष्ट्रवाद और अनुशासन की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।”
5 जनवरी 1934 को अजमेर में जन्मे मुरली मनोहर जोशी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी गहरी समझ ने उन्हें एक विद्वान नेता के रूप में स्थापित किया। प्रारंभिक जीवन से ही उन्होंने विचार और ज्ञान को अपनी ताकत बनाया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने वैचारिक राजनीति की शुरुआत की और भारतीय जनसंघ के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कदम रखा। आपातकाल के दौरान जेल जाकर उन्होंने संघर्ष और प्रतिबद्धता का परिचय दिया। यह दौर उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
1977 में अल्मोड़ा से पहली बार लोकसभा सांसद बने और जनता पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन में उन्होंने प्रमुख योगदान दिया। संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका निर्णायक रही।
1991 से 1993 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पार्टी को नई दिशा दी। ‘एकता यात्रा’ के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रवाद की भावना को जन-जन तक पहुंचाया। इस यात्रा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दिलाई।
1998 से 2004 तक मानव संसाधन विकास मंत्री और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री के रूप में उन्होंने काम किया। इस दौरान शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। उनके कार्यकाल को नीतिगत बदलावों के लिए याद किया जाता है।
वे कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे और संसद में एक विद्वान वक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। 2009 में वाराणसी और 2014 में कानपुर से सांसद चुने गए। उन्होंने हमेशा विचार आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी।
2017 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनका पूरा जीवन शिक्षा, विचार और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित रहा। मुरली मनोहर जोशी आज भी एक ऐसी विरासत हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती है।

