उत्तराखंड की बेटी ने बदलवा दिया सुप्रीम कोर्ट का फैसला, अब जज बनने के लिए 3 साल नहीं, 1 साल प्रैक्टिस काफी
नई दिल्ली/नैनीताल। BSF के पूर्व IG श्री बी.एस. टोलिया जी की सुपुत्री और सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट मेघा टोलिया की याचिका समेत 122 रिव्यू पिटीशन पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।
दरअसल, मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि लॉ ग्रेजुएट को ज्यूडिशियरी (सिविल जज जूनियर डिवीजन) का एग्जाम देने से पहले 3 साल तक किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के अधीन प्रैक्टिस करना अनिवार्य होगा। इस फैसले के खिलाफ देशभर से आवाज उठी थी।
डीडीहाट, उत्तराखंड की बेटी एडवोकेट मेघा टोलिया और उनके 5 साथियों ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में PIL / रिव्यू पिटीशन दायर की थी। कोर्ट ने देशभर से आई 122 रिव्यू पिटीशन को इसी के साथ क्लब कर दिया था और CJI की स्पेशल बेंच ने सुनवाई की थी।
कोर्ट का नया फैसला क्या है?
लंबी बहस के बाद 21 अगस्त 2025 को CJI सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने फैसला रिजर्व किया था, जिस पर अब निर्णय आया है:
- 3 साल की अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त को घटाकर 1 साल कर दिया गया है।
- 31 मार्च 2027 तक होने वाली सभी ज्यूडिशियल सर्विस भर्तियों में कोई भी लॉ ग्रेजुएट बिना प्रैक्टिस के भी आवेदन कर सकेगा। उसे 1 साल की प्रैक्टिस पूरी मानी जाएगी।
- चयन के बाद उम्मीदवार को 1 साल तक स्टेट ज्यूडिशियल अकादमी में ट्रेनिंग और 1 साल की क्लर्कशिप (6 महीने जिला जज के साथ और 6 महीने हाईकोर्ट जज के साथ) करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जज को प्रैक्टिकल अनुभव तो होना चाहिए, लेकिन अचानक 3 साल की शर्त थोपने से युवा वकीलों पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा।
इस फैसले के बाद उत्तराखंड सहित पूरे देश के हजारों लॉ ग्रेजुएट्स को बड़ी राहत मिली है।

