कुर्सी का नहीं, संस्कार का सम्मान होता है। एक अधिकारी व्यवहार कुशल होने से कितने लोगों को प्रभावित करते हैं.

परंतु कुछ अधिकारी कुर्सी पर बैठकर अपनी जागीर समझते हैं उनको ऐसे अधिकारियों से सीखना चाहिए कि किस तरीके से व्यवहार करना चाहिए दिल को छू जाने वाली कहानी

आज हम बात करते हैं विकास नगर ट्रेजेडी ऑफिस के कर्मचारियों की

कुर्सी का नहीं, संस्कार का सम्मान होता है।

देहरादून जनपद की विकासनगर ट्रेजरी में एक ऐसा अनुभव हुआ जिसने मेरे मन को भीतर तक छू लिया।
अपने एक आवश्यक कार्य से मैं ट्रेजरी पहुँचा। वहाँ सहायक लेखा अधिकारी बिटिया रेखा बिष्ट, जिनकी आयु लगभग 21–22 वर्ष होगी जिनका यहां एक काल्पनिक चित्र पोस्ट किया है,अपने कार्य में व्यस्त थीं। वे मुझे जानती भी नहीं थीं।
जैसे ही मैं उनके पास पहुँचा, उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा—”अंकल, बताइए… मैं आपकी क्या सहायता कर सकती हूँ?”

इन शब्दों में केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सेवा का सच्चा भाव था। उन्होंने बिना किसी अनावश्यक विलंब के मेरा कार्य पूरा कर दिया।

कार्य समाप्त होने पर मैंने उनसे कहा—
“बिटिया, आज के समय में आपका व्यवहार सचमुच अनुकरणीय है। आज अनेक लोग कुर्सी पर बैठते ही यह भूल जाते हैं कि वे जनता के सेवक हैं। अधिकार मिलते ही कुछ लोगों के व्यवहार में ऐसा परिवर्तन आ जाता है कि आम नागरिक अपने ही वैध कार्य के लिए महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाने को विवश हो जाता है।”

मेरी बात सुनकर बिटिया रेखा बिष्ट ने जो उत्तर दिया, उसने मेरे हृदय को स्पर्श कर लिया। उन्होंने सहज भाव से कहा—”अंकल, इस दुनिया से कोई कुछ लेकर नहीं जाता। मनुष्य का व्यवहार ही लोगों के दिलों में रह जाता है। यदि हमारे पद से किसी की सहायता हो जाए तो इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है? इस कुर्सी का घमंड कैसा? आज है, कल नहीं रहेगी।”

इतनी कम आयु में जीवन का इतना गहरा दर्शन! मैं कुछ क्षणों के लिए निःशब्द हो गया। लगा मानो ईश्वर ने एक बेटी के माध्यम से जीवन का अमूल्य संदेश दे दिया हो।

समय का चक्र और सत्ता का सत्य

इसी क्षण मुझे वर्षों पुराना एक वास्तविक संस्मरण याद आ गया। उत्तराखंड के एक अत्यंत प्रभावशाली पूर्व मुख्यमंत्री, जब स्वयं पद पर नहीं थे, तब उन्हें अपने एक पूर्णतः वैध कार्य के लिए उस समय के मुख्यमंत्री से फ़ोन पर अनुरोध करना पड़ा। किंतु आश्चर्य की बात यह रही कि उनका कार्य तब भी नहीं हो सका। उस समय उनके मुख से सहज ही निकला—”क्या होगा इस देवभूमि उत्तराखंड का?”

उनकी यह वेदना केवल एक व्यक्ति की नहीं थी; वह उस व्यवस्था की पीड़ा थी, जिसमें कभी-कभी उचित कार्य भी समय पर नहीं हो पाते। यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि सत्ता का वैभव क्षणिक होता है, पर व्यवस्था का अनुभव सबको समान रूप से होता है।

मेरी अपनी पीड़ा भी इससे भिन्न नहीं रही। मेरी पेंशन सेवानिवृत्ति के सात महीने बाद अथक प्रयासों और निरंतर भागदौड़ के पश्चात प्रारंभ हुई।

मेरी धर्मपत्नी की सेवानिवृत्ति को पाँच महीने से अधिक समय हो चुका है, किंतु उनकी पेंशन आज तक प्रारंभ नहीं हो सकी है। यह केवल मेरी वेदना नहीं है; यह उन हजारों सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पीड़ा है, जिन्हें अपने ही अधिकार के लिए बार-बार निवेदन करना पड़ता है।

मैं सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और कर्मचारियों से केवल इतना ही कहना चाहता हूँ—
सत्ता स्थायी नहीं होती। पद स्थायी नहीं होता। कुर्सी स्थायी नहीं होती।

आज जो व्यक्ति अधिकार के शिखर पर बैठा है, कल वही किसी कार्यालय में एक सामान्य नागरिक की तरह अपने वैध कार्य के लिए खड़ा हो सकता है। उस दिन उसे भी उसी संवेदनशीलता, उसी सम्मान और उसी सहयोग की अपेक्षा होगी, जिसकी अपेक्षा आज हर आम नागरिक करता है।

यदि हर अधिकारी रेखा बिष्ट जैसी सेवा-भावना, विनम्रता और मानवीय संवेदना को अपने जीवन का हिस्सा बना ले, तो शासन और प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास कई गुना बढ़ जाएगा। वास्तव में किसी भी कार्यालय की सबसे बड़ी पहचान उसकी इमारत नहीं, वहाँ बैठे लोगों का व्यवहार होता है।

आज मैं उस बेटी को हृदय से आशीर्वाद देता हूँ। ईश्वर उसे दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, उज्ज्वल भविष्य और निरंतर प्रगति प्रदान करें। उसकी यही विनम्रता, यही सेवा-भाव और यही मानवीय दृष्टि जीवनभर बनी रहे, क्योंकि ऐसे ही लोग समाज और राष्ट्र का वास्तविक गौरव होते हैं।

अंत में केवल इतना ही—
“कुर्सियाँ बदलती रहती हैं, सत्ता आती-जाती रहती है;
किंतु मधुर व्यवहार, सेवा का भाव और मानवीय संवेदनाएँ ही मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान बनकर अमर हो जाती हैं।”

बिटिया रेखा बिष्ट, आज आपने मेरा कार्य ही नहीं किया, बल्कि अपने कुछ सरल शब्दों से जीवन का एक अमूल्य पाठ भी पढ़ा दिया। इसके लिए आपको मेरा स्नेह, आशीर्वाद और हार्दिक शुभकामनाएँ।

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