भाजपा के संगठन में इस समय यदि कोई किंग मेकर है तो वह हैं सुनील बंसल – पश्चिम बंगाल के प्रभारी और राष्ट्रीय महामंत्री. सुनील जी को वाक़ई मैन विथ गोल्डन हैंड बोलना अनुचित न होगा.

सबसे पहली बार उनका नाम चर्चा में आया था 2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश के सह प्रभारी के रूप में. उस समय अमित शाह मुख्य प्रभारी थे, और जीत का श्रेय उन्हें दिया गया था, पर पर्दे के पीछे मुख्य भूमिका बंसल जी की ही थी. फिर सुनील बंसल को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया. उनके रहते प्रदेश में योगी सरकार आई 2017 में, फिर 2019 में भी मोदी सरकार का प्रचंड बहुमत आया और फिर 2022 में भी पुनः योगी सरकार की वापसी हुई. 2022 जीत के पश्चात बंसल जी का तबादला हो गया और उनके जाते ही उत्तर प्रदेश में भाजपा का विजय रथ रुक गया 2024 लोकसभा चुनावों में भाजपा गठबंधन की उत्तर प्रदेश में शर्मनाक हार हुई और मोदी जी केंद्र में पूर्ण बहुमत से दूर हुवे. इन फैक्ट जो लोग चुनावी राजनीति समझते हैं उन्हें पता है एक समय दिख रहा था कि स्वयं मोदी जी वाराणसी हार सकते हैं तो ऐन मौके पर बंसल जी को वाराणसी लाया गया कि यह सीट नहीं हारना चाहिए.

उत्तर प्रदेश के पश्चात बंसल जी को जिम्मेदारी मिली तीन प्रदेशों की – पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तेलंगाना. उस समय इन तीनों ही प्रदेशों में विपक्ष की सरकारें थी. बंसल जी का जादू चला और पहले उड़ीसा तथा तेलंगाना में लोकसभा में भाजपा जीती और आज अंततः पश्चिम बंगाल विधान सभा में प्रचंड जीत हासिल हुई.

पश्चिम बंगाल में पिछले चुनाव के पश्चात ममता बनर्जी द्वारा किए गए क्रूर दमन से भाजपा का कार्यकर्ता हतोत्साहित था. आप टीवी पर प्रचार तो कर लोगे पर अंत में बूथ पर चुनाव लड़ते कार्यकर्ता ही हैं. ऐसे मृत पड़े संगठन और ममता जैसी क्रूर तानाशाह के प्रदेश में कार्यकर्ताओं में फिर उत्साह भरना कि वह ममता के सामने सीना ठोक खड़े हो सके आसान न था. नारा दिया गया भोय दूर भोरोसा बरो. जहाँ एक ओर दुनिया और यहाँ तक कि मोमता दी की निगाहें मोदी की रैली पर रहती थीं असली खेला बंगाल के गाँव गाँव में हो रहा था. गली नुक्कड़ों पर 12,000 बैठकें हुईं, वोटर्स से संवाद बढ़ाने के लिए 1,65,000 बैठके हुईं. हर वोटर के संपर्क में कोई न कोई भाजपा का कार्यकर्ता था. योजना बनी कि सीधे ममता को टारगेट नहीं करना है बल्कि हमला सीधे स्थानीय विधायकों पर किया गया. जाहिर सी बात है विधायकों के प्रति नाराजगी सबकी होती ही है. हर सीट पर विधायकों के ख़िलाफ़ चार्ज शीट तैयार की गई और इसे खूब शोर शराबे के साथ हर विधान सभा में रिलीज किया गया. अंत में स्वयं ममता के ख़िलाफ़ चार्ज शीट अमित शाह जी के द्वारा रिलीज़ की गई. और अंत में बंसल जी का बूथ मैनेजमेंट तो सोने पे सुहागा था ही.

आज का दिन भाजपा की जीत का है. उन लाखों कार्यकर्ताओं के गिलहरी प्रयास की विजय का दिन है. पर कहना अनुचित न होगा इन चुनावों से भारत की राजनीति के असली कौटिल्य के रूप में सुनील बंसल का नाम पक्का हो गया.

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