हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रानीपुर नगर के द्वारा मनाया गया

मनोज ठाकुर

हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रानीपुर नगर, हरिद्वार जिला

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, विक्रमी संवत 1730, तदनुसार 6 जून 1674 को छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलन एवं गणेश वंदना से हुआ।

Moms Pride स्कूल एवं Rising Star स्कूल के बच्चों के द्वारा शिवाजी महाराज के जीवन के प्रसंगों की नाट्य प्रस्तुति दी गई।

श्री पालीवाल जी द्वारा एक वीररस की कविता प्रस्तुत की गई।

मुख्य वक्ता द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र को प्रस्तुत करते हुए माता जीजाबाई और संरक्षक दादा कोणदेव के योगदान पर प्रकाश डाला। छत्रपति शिवाजी महाराज के बचपन के मावले साथियों ने जीवन भर शिवाजी महाराज का सभी युद्धों एवं अभियानों में सहयोग किया एवं अपने प्राण न्यौछावर किए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण दिवस को अपने 6 उत्सवों में सम्मिलित किए जाने के पीछे उद्देश्य यह रहा कि शिवाजी ने अंधेरे में एक किरण की भांति शताब्दियों से प्रताड़ित हिंदुओं पुनः एकजुट कर गर्व की अनुभूति कराई।

संघ इस शताब्दी वर्ष में समाज में पंच परिवर्तन के द्वारा समाज को एकजुट एवं समरस कर अपनी संस्कृति पर गर्व करने के भाव को जागृत करने पर लगा है।
अध्यक्ष श्री ललित बत्रा जी ने शिवाजी के गुणों का वर्णन किया एवं समाज विशेषकर युवाओं को उनसे प्रेरणा लेने की आवश्यकता पर बल दिया

छत्रपति शिवाजी महाराज जीवन परिचय

(1630–1680) मराठा साम्राज्य के संस्थापक और एक महान दूरदर्शी योद्धा थे। उन्होंने मुगलों और बीजापुर सल्तनत के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष करके स्वतंत्र ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की स्थापना की। उन्हें उनकी कुशल प्रशासनिक क्षमता और ‘गनिमी कावा’ (छापामार युद्ध) की रणनीतियों के लिए जाना जाता है。

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
जन्म: 19 फरवरी 1630 (कुछ इतिहासकार 1627 भी मानते हैं) को पुणे के निकट शिवनेरी दुर्ग में
परिवार: उनके पिता शाहजी भोंसले एक शक्तिशाली मराठा सरदार थे और माता राजमाता जीजाबाई एक अत्यंत धार्मिक एवं साहसी महिला थी
प्रशिक्षण: शिवाजी का लालन-पालन उनकी माता और संरक्षक दादोजी कोंडदेव की देखरेख में हुआ। उन्होंने बचपन से ही युद्ध कौशल, घुड़सवारी और कूटनीति की शिक्षा प्राप्त की。
प्रमुख ऐतिहासिक पड़ाव
स्वराज्य की शुरुआत: मात्र 16 वर्ष की आयु में (1646 ई.), उन्होंने बीजापुर सल्तनत के अधीन ‘तोरण’ किले को जीतकर अपने स्वतंत्र राज्य की नींव रखी。
अफजल खान का वध: 1659 में बीजापुर के सुल्तान द्वारा भेजे गए सेनापति अफजल खान ने कूटनीति से शिवाजी को मारने का षड्यंत्र रचा, जिसे शिवाजी ने अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से विफल कर दिया。
मुगलों से संघर्ष: उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब की विशाल सेना को कई बार मात दी। 1665 में पुरंदर की संधि के बाद उन्हें मुगलों के अधीन कुछ किले सौंपने पड़े थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी कूटनीति से कई किले वापस छीन लिए。
राज्याभिषेक और शासन व्यवस्था
छत्रपति की उपाधि: 1674 में रायगढ़ के किले में उनका भव्य राज्याभिषेक हुआ और उन्हें ‘छत्रपति’ की उपाधि से विभूषित किया
अष्टप्रधान मंडल: उनके शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी, जिसे ‘अष्टप्रधान’ कहा जाता था।
धर्मनिरपेक्ष नीतियां: शिवाजी की सेना में अनेक मुस्लिम सैनिक और अधिकारी उच्च पदों पर थे। उनके राज्य में सभी धर्मों के लोगों को स्वतंत्रता और सम्मान प्राप्त था
नौसेना का जनक: भारतीय समुद्री तटों की रक्षा के लिए उन्होंने मजबूत नौसेना (Navy) का भी निर्माण किया था。
विरासत
3 अप्रैल 1680 को शिवाजी महाराज का निधन हो गया。 उनका जीवन आज भी देशभक्ति, साहस, और जन-कल्याण का प्रतीक है। उनके द्वारा स्थापित स्वराज्य की नींव ने आगे चलकर मराठा साम्राज्य को भारत की सबसे शक्तिशाली ताकतों में बदल दिया
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कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्री दिनेश सेमवाल, प्रांत कार्यवाह उत्तराखंड, अध्यक्ष श्री ललित बत्रा, जैनिको फार्मा, सिडकुल, आरएसएस नगर प्रचार प्रमुख दिवेश वशिष्ठ जी

विशिष्ट अतिथि
श्री स्वामी धर्मानंद, योग धर्मार्थ चिकित्सालय, श्री महंत बाबा दिगंबर विनोद गिरी जी, सचिव महानिर्वाणी अखाड़ा रहे
मंच संचालन श्री आर्यवीर जी ने किया, कार्यक्रम के संयोजक श्री चन्द्रमुकुट जी रहे।
कार्यक्रम के अंत में प्रार्थना की गई। माननीय नगर संघचालक श्री वकील जी ने सभी अतिथियों एवं मंदिर समिति का आभार व्यक्त किया।

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