दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे से जुड़ा एक अनोखा मामला इन दिनों चर्चा में है, जहाँ सर्विस रोड के बीचों-बीच खड़ा एक घर लोगों का ध्यान खींच रहा है।

गाजियाबाद के मंडोला गांव में बना “स्वाभिमान” नाम का यह मकान अब भारत का अपना “नेल हाउस” बन गया है—कुछ वैसा ही जैसा चीन में देखने को मिला था।

चीन में चीन के एक जमीन मालिक Ye Yushou ने हाईवे के लिए अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद सड़क को उसके घर के चारों ओर बनाना पड़ा। उसी तरह अब भारत में भी यह मामला सामने आया है।

मंडोला गांव का यह करीब 1600 वर्ग मीटर में बना दो मंजिला मकान दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे के निर्माण के बीच आ गया। 213 किलोमीटर लंबी इस परियोजना का उद्घाटन 14 अप्रैल को नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया, लेकिन यह घर अब भी सर्विस रोड के बीचों-बीच खड़ा है।

इस मकान को लेकर विवाद नया नहीं है। साल 1998 से ही जमीन अधिग्रहण को लेकर मामला चल रहा है। मकान के मालिक स्वर्गीय डॉ. वीरसेन सोराह ने उत्तर प्रदेश आवास बोर्ड द्वारा जमीन अधिग्रहण को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

बाद में यह जमीन उनके पोते लक्ष्यवीर सरोह के नाम पर हो गई। जब भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने एक्सप्रेसवे के लिए इस जमीन की जरूरत बताई, तो मामला फिर से गरमा गया।

2024 में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहाँ अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए—यानि न घर तोड़ा जाएगा, न आगे निर्माण होगा, जब तक फैसला नहीं आ जाता।

परिवार का कहना है कि उन्हें मौजूदा बाजार दर के अनुसार उचित मुआवजा दिया जाए, तभी वे जमीन छोड़ेंगे।

213 किमी लंबा यह दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे दोनों शहरों के बीच यात्रा समय को 6 घंटे से घटाकर लगभग 2–2.5 घंटे कर देगा। करीब 12,000–13,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना के बीच खड़ा यह “स्वाभिमान” घर अब कानून, अधिकार और विकास के बीच संतुलन की बड़ी कहानी बन गया है।

यह सिर्फ एक मकान नहीं… बल्कि अपने हक और स्वाभिमान की लड़ाई का प्रतीक है।

इसलिए कहते हैं जब कोई आदमी ठान लेता है तो वह कुछ भी कर सकता है सरकार कुछ नहीं कर सकती किसी की हड़ के आगे

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