2003 मे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री तिरुपति दर्शन करके लौट रहे थे। कार तक पहुँचते उससे पहले ही ब्लास्ट हुआ और मुख्यमंत्री बाल बाल बच गए। ये चंद्रबाबू नायडू थे जिन्हे भगवान ने एक बार जान खोने से बचाया और फिर 2024 मे पहचान खोने से।

1982 मे तेलुगु फिल्मो के सुपरस्टार और आंध्र के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव कांग्रेस से अलग होकर TDP बनाते है और कांग्रेस को सत्ता के बाहर कर देते है। कालांतर मे उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू TDP पर कब्ज़ा कर लेते है। TDP की छवि शुरू से कांग्रेस विरोधी की रही है और वोट भी इसीलिए मिलते है।

1996 मे चंद्रबाबू मुख्यमंत्री बने और 2004 तक बने रहे, इसी बीच हैदराबाद आईटी हब बना, कांग्रेस विरोध दर्शाना था इसलिए 1999 मे नायडू ने वाजपेयी जी की सरकार को बाहर से समर्थन दिया।

मगर 2004 के बाद नायडू की दशा बिगड गयी, आंध्र के चुनाव मे कांग्रेस ने पराजित किया। नायडू का प्रभाव पूर्वी आंध्र मे ज्यादा था, 2012 मे कांग्रेस ने आंध्र के बंटवारे को मंजूर कर लिया नायडू का प्रभाव सीमित हो गया।

2014 मे नायडू अधिकारिक रूप से NDA मे शामिल हुए। कांग्रेस का बंटवारे का दांव उल्टा पड़ गया क्योंकि नए राज्य तेलंगाना मे TRS ने सत्ता पकड़ लीं और आंध्र मे नायडू जीत गए।

आंध्रप्रदेश मे कांग्रेस विरोधी लहर थी ऐसे मे कांग्रेस एक बार फिर टूटी, जगन मोहन रेड्डी अलग हो गए और नयी पार्टी YSR कांग्रेस बनी। अब नायडू आंध्र के निर्विरोध नेता थे और ओवर कॉन्फिडेंस मे आ गए।

2018 मे बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस के साथ चले गए ताकि तेलंगाना भी जीत सके, मगर दोनों राज्यों की तेलुगु जनता इतनी ज्यादा नाराज हुई कि तेलंगाना तो वापस TRS को मिला ही उल्टे आंध्र प्रदेश मे भी नायडू का सफाया कर दिया।

दूसरी तरफ बीजेपी को 303 सीटें मिल गयी, कांग्रेस मे जाने के कारण TDP के नेता नायडू से दूर होने लगे इसलिए नायडू एक राजनीतिक अछूत हो गए। आंध्र के नए मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी बीजेपी के नए दोस्त बन चुके थे और राज्य सभा मे बीजेपी के सुर मे सुर मिलाने लगे।

रेड्डी ने नायडू को जेल तक भेज दिया, लेकिन फिर दक्षिण मे हिंदुत्व के भविष्य और आंधी कहे जाने वाले पवन कल्याण की एंट्री होती है। पवन कल्याण नायडू और बीजेपी की सुलह करवाते है, 2024 के आंध्र प्रदेश मे ये गठबंधन ऐसा जीता कि रेड्डी का सफाया हो गया।

जो नायडू राजनीतिक अछूत थे वे अब केंद्र मे भी किंग मेकर बन चुके थे। बहुत लोग सोचते थे कि नायडू बहुत सारे मंत्रालय मांगेंगे मगर ऐसा नहीं हुआ।

नायडू ने बीजेपी से दो मंत्रालय लिये और आंध्र लौटकर अपनी खोयी शक्ति संजोने मे लग गए। नायडू के पीछे एक हाथ पवन कल्याण का भी है, हम दक्षिण की खबरें कम सुनते है मगर पवन कल्याण का जो क्रेज बढ़ रहा है वो हमें पता ही नहीं है।

चंद्रबाबू नायडू इसी वज़ह से इतने शरीफ दिखाई पड़ रहे है। 2018 से 2023 जो वनवास इन्होने झेला है वो वनवास आज भी सपने मे आकर डराता जरूर होगा। दूसरी ओर बीजेपी आंध्र प्रदेश मे बेताज बादशाह हो गयी।

जगन मोहन रेड्डी आज भी बीजेपी के हर बिल का समर्थन करते है। नायडू तो खुद सरकार मे है, बीजेपी के अन्नामलाई तो है ही मगर पवन कल्याण भी दक्षिणी राज्यों मे हिंदुत्व की पीच तैयार कर रहे है और इसीलिए तमिलनाडु जैसे राज्य मे भी बीजेपी का वोट शेयर 12% पर पहुँच गया जो 3 से ज्यादा नहीं था।

जिस दिन ये 12 से 35 हुआ समझो तमिलनाडु भी जीत लिया। दक्षिण पर ज़ब भी बीजेपी का शासन होगा वो आंध्रप्रदेश का आभार जरूर व्यक्त करेंगी और नायडू की ये कड़ी परीक्षा है ये 5 साल उन्हें बीजेपी की ज्यादा जरूरत है ताकि अपनी खोयी राजनीतिक भूमि पा सके।

तेलंगाना मे भले ही कांग्रेस लौट चुकी है मगर नायडू के माध्यम से ही तेलंगाना को बीजेपी 2028 मे साध सकती है। तमिलनाडु मे DMK के वोट काटने विजय थालापति आ चुका है। आज नहीं तो कल तमिलनाडु गिरा देंगे।

कर्नाटक की तो चिंता ही नहीं है, बस एक केरल बचता है जहाँ हिन्दुओ के साथ ईसाईयों को भी साथ लेना पड़ेगा, कैसे वो एक यक्ष प्रश्न है? आगामी 10 वर्ष दक्षिण की राजनीति मे ख़ास होने वाले है और केंद्र आंध्रप्रदेश ही रहेगा जैसे उत्तर मे गुजरात और मध्यप्रदेश है
साभार 🙏

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *