मातृ सदन के संत ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के अविछिन्न अनशन-सत्याग्रह को आज छः दिवस पूरे हो चुके हैं


मातृ सदन, हरिद्वार

मातृ सदन के संत ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के अविछिन्न अनशन-सत्याग्रह को आज छः दिवस पूरे हो चुके हैं

। सत्याग्रह वर्तमान जिला जज हरिद्वार श्री नरेंद्र दत्त के विरुद्ध गंभीर आपत्तियों को लेकर किया जा रहा है। माँग स्पष्ट है—उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए तथा मातृ सदन के विरुद्ध अपने आदेश में की गई कथित आधारहीन और गरिमा-विरुद्ध टिप्पणियों के लिए लिखित क्षमा-याचना दी जाए। श्री नरेंद्र दत्त ने मातृ सदन पर “ब्लैकमेलिंग”, “मनमाफिक आदेश पाने हेतु झूठी शिकायतें” तथा “दुराचार” जैसे गंभीर आरोप लगाए, संतों की निष्ठा और वेशभूषा पर टिप्पणी की तथा ऐसे पत्रों को रिकॉर्ड में लिया जो उन्हें सीधा संबोधित ही नहीं थे और एक आपराधिक जाँच को प्रभावित करने वाले वक्तव्य कहे।

उल्लेखनीय है कि उनके सेवा-रिकॉर्ड और कार्यशैली पर पहले भी गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं तथा उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कई अवसरों पर उनके आचरण की कठोर आलोचना की है।

कोटद्वार के बहुचर्चित मामले में याचिकाकर्ता रेखा रघुवंशी की याचिका पर 13-10-2023 के आदेश में न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि उनका आचरण न्यायिक पद की मर्यादा के प्रतिकूल है और आदेश को उनके सेवा अभिलेख में दर्ज करने के निर्देश दिए। इस आदेश को उन्होंने भारत का सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, किंतु राहत नहीं मिली।

इसी प्रकार जिला जज रहे धनंजय चतुर्वेदी प्रकरण में 29-12-2023 के आदेश से स्पष्ट हुआ कि सहकर्मी न्यायाधीश के विरुद्ध कथित रूप से रिकॉर्डिंग कराकर उन्हें पद से हटाने का प्रयास किया गया, परंतु शिकायत निराधार पाई गई और संबंधित न्यायाधीश को पुनः बहाल किया गया।

विशेष रूप से उल्लेखनीय दीपाली शर्मा प्रकरण है, जिसमें रजिस्ट्रार जनरल रहते हुए एक गुमनाम शिकायत पर कार्रवाई करते समय यह दावा किया गया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के निर्देश प्राप्त थे, जबकि ऐसे किसी निर्देश का न लिखित रिकॉर्ड था न मौखिक प्रमाण। इसके बाद उनके निवास पर छापा डाला गया, नाबालिग को प्रताड़ित करने का आरोप लगाकर मामला बनाया गया, जो बाद में पूर्णतः असत्य सिद्ध हुआ और लगभग छह वर्ष बाद हाई कोर्ट के निर्णय से वे निर्दोष घोषित हुईं। 130-पृष्ठीय निर्णय में संबंधित अधिकारी श्री नरेंद्र दत्त/रेजिस्ट्रार जनरल का नाम 45 बार आया और उनपर षड्यन्त्र करने का सीधा आरोप लगा।

6 दिसंबर 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार भी उनके द्वारा जाँची गई गुमनाम शिकायत के आधार पर तीन न्यायिक अधिकारियों के निलंबन की कार्रवाई हुई थी, जो अब पूर्णतः संदेहास्पद है। श्री नरेंद्र दत्त के कार्यकाल में “गुमनाम” शिकायतों के आधार पर कई कार्रवाइयाँ हुईं और जिन सब में एक प्रतिशोधात्मक पैटर्न स्पष्ट है।

मातृ सदन की मांग है कि उनके कार्यकाल की सभी जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाए। जब तक निलंबन और लिखित माफी की माँग पूरी नहीं होती, सत्य, न्यायिक मर्यादा और न्यायपालिका की विश्वसनीयता की रक्षा हेतु सत्याग्रह जारी रहेगा।

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