यूपी पंचायत चुनाव पर संकट के बादल: ओबीसी आयोग के गठन में देरी से टल सकते हैं चुनाव
उत्तर प्रदेश में अप्रैल-मई में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। प्रदेश में ‘समर्पित पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग’ का गठन अब तक न होने के कारण आरक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह अटक गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि आयोग का गठन जल्द नहीं हुआ, तो चुनाव अपने निर्धारित समय से आगे बढ़ सकते हैं।
आरक्षण का ‘ट्रिपल टेस्ट’ बना बड़ी बाधा
सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों के अनुसार, निकाय और पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने से पहले एक समर्पित आयोग द्वारा पिछड़ेपन का सर्वे कराना अनिवार्य है। पंचायतीराज विभाग ने 6 सदस्यीय आयोग के गठन का प्रस्ताव शासन को भेज दिया है, लेकिन अभी तक इस पर अंतिम मुहर नहीं लग पाई है। बिना आयोग की रिपोर्ट के सीटों का आरक्षण तय होना असंभव है।
मंत्री राजभर का दावा: समय पर होंगे चुनाव
एक ओर जहाँ देरी की खबरें चर्चा में हैं, वहीं पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने भरोसा जताया है कि चुनाव समय पर ही संपन्न होंगे। उन्होंने कहा:
“मुख्यमंत्री से जल्द मुलाकात कर आयोग के गठन को अंतिम रूप दिया जाएगा। यदि आयोग आज गठित होता है, तो वह अगले 2 महीनों में अपनी सर्वे रिपोर्ट दे सकता है, जिससे आरक्षण प्रक्रिया समय पर पूरी हो सकेगी।”
जनगणना और आरक्षण का गणित
प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण 2011 की जनगणना के आधार पर (क्रमशः 20.69% और 0.56%) तय है। लेकिन ओबीसी के मामले में स्थिति पेचीदा है:
आबादी का अनुमान: 2015 के रैपिड सर्वे के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में ओबीसी आबादी 53.33% है।
आरक्षण की सीमा: किसी भी ब्लॉक या पंचायत में ओबीसी आबादी कितनी भी अधिक क्यों न हो, उन्हें 27% से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
नगर निकाय चुनावों की तर्ज पर अब पंचायत चुनावों में भी ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूला लागू होगा। यदि शासन अगले कुछ दिनों में आयोग की घोषणा नहीं करता है, तो निर्वाचन आयोग के लिए अप्रैल-मई की समय सीमा को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल, भावी उम्मीदवारों की धड़कनें आरक्षण के इस नए पेंच के कारण बढ़ी हुई हैं।

