बदरीनाथ धाम में एक ऐसी महान साधिका थीं, जिनकी पूरी संपत्ति केवल भगवान नारायण का चिंतन, मनन और कठोर साधना थी।
साधना, तप, सम्मान, प्रतिष्ठा या भौतिक संपत्ति का लेशमात्र भी मोह उन्हें कभी छू नहीं सका। उनका संपूर्ण जीवन भगवान श्रीहरि की निस्वार्थ भक्ति और सेवा को समर्पित रहा।
भागवती माई प्रतिदिन प्रातः स्नान-ध्यान के बाद भगवान बदरीविशाल के मंदिर पहुंचतीं और अपने मधुर कंठ से श्रीमद्भागवत के श्लोक सुनातीं। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करतीं और भगवान बदरीविशाल के लिए पहली तुलसी की माला स्वयं गूंथकर अर्पित करती थीं। यह क्रम लगातार 76 वर्षों तक बिना किसी व्यवधान के चलता रहा।
ईश्वर की साधना के मार्ग पर बहुत कम ऐसे साधक होते हैं, जो बिना किसी अपेक्षा, इच्छा, भौतिक सुख, सम्मान या प्रसिद्धि की लालसा के केवल भगवान के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दें। भागवती माई ऐसी ही एक विरली तपस्विनी थीं।
मात्र 14 वर्ष की आयु में वे नेपाल स्थित अपने गांव से पैदल यात्रा कर बदरीनाथ धाम पहुंचीं। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के लगभग 76 वर्ष बदरीनाथ में ही भगवान श्रीहरि नारायण के अर्चन, वंदन, चिंतन, मनन और भजन में समर्पित कर दिए। लगभग 90 वर्ष की आयु तक वे बदरीनाथ धाम में ही रहीं और अंततः वहीं देह त्यागी।
भागवती माई का जीवन अत्यंत सादा था। बदरीनाथ में एक छोटी-सी कुटिया, पहनने के लिए केवल दो जोड़ी वस्त्र और हर समय “नारायण-नारायण” का जाप—यही उनकी जीवनभर की सबसे बड़ी संपत्ति थी। उन्होंने कभी धन, प्रतिष्ठा या साधना से मिलने वाले सम्मान की इच्छा नहीं की।
बदरीनाथ धाम को मोक्षधाम और भू-बैकुंठ कहा जाता है। यहां भगवान नारायण की साधना का सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता। लेकिन अक्सर साधना के साथ प्रतिष्ठा और अहंकार का भाव भी जुड़ जाता है। भागवती माई ने जीवनभर स्वयं को इन सभी मोहों से दूर रखा और केवल भगवान बदरीविशाल की अनन्य भक्त बनी रहीं।
स्थानीय लोग बताते हैं कि बदरीनाथ में भागवती माई जैसी निस्वार्थ और तपस्विनी साधिका बहुत विरले ही हुई हैं। बदरीनाथ के निकट बामणी गांव के बलदेव मेहता बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में भागवती माई जैसी साधना, तप के अहंकार से मुक्त और भौतिक संपत्ति से पूर्णतः विरक्त साधिका कभी नहीं देखी।
बदरीनाथ मंदिर के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल के अनुसार, भागवती माई प्रतिदिन मंदिर पहुंचकर भगवान बदरीविशाल को श्रीमद्भागवत के श्लोक सुनाती थीं, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करती थीं और पहली तुलसी माला स्वयं भगवान को अर्पित करती थीं। यह उनकी दैनिक साधना का अभिन्न हिस्सा था।
प्रत्येक एकादशी को वे नारद शिला पर प्रातः 4 बजे से रात्रि 8 बजे तक एक ही आसन पर बैठकर श्रीमद्भागवत का पारायण करती थीं। उनका प्रत्येक एकादशी व्रत निर्जला होता था।
लगभग 90 वर्ष की आयु में भागवती माई ने बदरीनाथ धाम में ही अपने प्राण त्यागे। उनका अंतिम संस्कार बदरीनाथ में ब्रह्मकपाल से ऊपर स्थित पवित्र सोनकात्री क्षेत्र में किया गया।
भागवती माई ने कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया। गुरु बनने या प्रसिद्धि पाने की इच्छा उनसे कोसों दूर थी। वे सभी को समान भाव, स्नेह और करुणा से देखती थीं। उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची भक्ति में न अहंकार होता है, न प्रसिद्धि की चाह और न किसी प्रकार का स्वार्थ।
भागवती माई का जीवन आज भी यह संदेश देता है कि यदि मन पूर्ण रूप से भगवान को समर्पित हो जाए, तो संसार की कोई भी वस्तु मनुष्य को आकर्षित नहीं कर सकती। उनका तप, त्याग और निस्वार्थ भक्ति सदैव श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।
🙏 जय बदरीविशाल

