कोई झूठा वादा न करे, बस इतना ही चाहता था बिलौटी का एक युवा…
भोजपुर जिले के बिलौटी गांव का एक युवा — भरत भूषण तिवारी। गंगा कटाव से प्रभावित लोगों की पीड़ा को लेकर वह वर्षों से व्यवस्था के दरवाजे खटखटा रहा था। ज्ञापन दिए, अधिकारियों से मिला, गुहार लगाई, लेकिन जब उसे लगा कि उसकी आवाज़ कहीं नहीं सुनी जा रही, तब उसने विरोध का एक ऐसा रास्ता चुन लिया, जिसका अंत दुखद होना लगभग तय था।
हाल ही में वायरल हुए वीडियो में भरत पुलिस के सामने हथियार लहराते हुए दिखाई देता है। वीडियो में वह व्यवस्था के प्रति अपनी नाराजगी भी व्यक्त करता है। उसकी माँ बीच-बचाव करती नजर आती हैं। पुलिस लौट जाती है और बाद में आधिकारिक तौर पर कहा जाता है कि युवक मानसिक रूप से अस्वस्थ है तथा उसके इलाज की व्यवस्था की जाएगी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
जब वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आने लगीं, तब अगले ही दिन पुलिस भारी बल के साथ फिर पहुंचती है। वही युवक, जिसे एक दिन पहले मानसिक रूप से विक्षिप्त बताया गया था, अब पुलिस कार्रवाई के केंद्र में था।
बताया जाता है कि भरत गंगा कटाव से प्रभावित जमानियां गांव के विस्थापितों की लड़ाई लड़ रहा था। उसका तरीका गलत हो सकता है, कानून अपने हाथ में लेना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन कुछ सवाल ऐसे हैं जिन्हें अनदेखा भी नहीं किया जा सकता।
यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर था, तो क्या उसे नियंत्रित करने का तरीका वही होना चाहिए था जो किसी पेशेवर अपराधी के लिए अपनाया जाता है?
यदि उसने हथियार छोड़ दिया था और आत्मसमर्पण की बातचीत चल रही थी, तो क्या उसे जीवित पकड़ने के सभी विकल्प पूरी तरह समाप्त हो चुके थे?
क्या एक ऐसे युवक की पीड़ा, जो गंगा कटाव से उजड़े लोगों के लिए आवाज उठा रहा था, केवल उसकी गलती के साथ ही दफन हो जानी चाहिए, या उसके उठाए गए मुद्दों पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए?
भरत तिवारी ने व्यवस्था से संघर्ष का रास्ता चुना, लेकिन शायद वह भूल गया कि एक आम नागरिक और राज्य की शक्ति के बीच की लड़ाई का परिणाम अक्सर एक जैसा ही होता है।
आज आवश्यकता केवल घटना पर बहस करने की नहीं है, बल्कि उन कारणों को समझने की भी है जो किसी युवा को इस हद तक निराश, आक्रोशित और अकेला महसूस करने पर मजबूर कर देते हैं ब्राह्मण को सजा

