उत्तराखंड में अब कुछ अच्छा होने वाला है क्योंकि संगठन महामंत्री के कारण कुछ नेताओं को दरकिनार किया जा रहा था उनका चुनाव में भारी नुकसान को देखते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी द्वारा निर्णय लिया गया

अब देखना होगा क्यों उत्तराखंड में बीजेपी तीसरी बार सरकार बनती है या नहीं

आख़िरकार उत्तराखंड से अजय कुमार का ‘निपल्टा”….
👉टिकट वितरण के खेल से लेकर सरकारी ठेकों मे थी जबरदस्त दखल
👉रेसकोर्स के ‘तीसरे माले” की कोठी बन गईं थी दूसरा सेंटर पावर
👉 अजय कुमार के कारण कई नेताओं ने बीजेपी दफ्तर आना बंद कर दिया था
👉 नितिन नबीन के आने से पहले मुख्यमंत्री निवास की डिनर डिप्लोमेसी से शुरू हुआ मैंनेजमेंट
👉अरविन्द पांडेय क़ो गमला भेंट के बाद दूसरा कदम
उत्तराखंड के भाजपा में विवादित संगठन महामंत्री अजय कुमार का राजस्थान स्थानांतरण केवल एक सामान्य संगठनात्मक फेरबदल नहीं है.राजनीतिक गलियारों में इसे 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा नेतृत्व द्वारा एंटी-इनकंबेंसी को नियंत्रित करने की रणनीति है।
कुछ दिन पहले देहरादून पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि पार्टी को एंटी-इनकंबेंसी जैसी चुनौतियों पर गंभीरता से काम करना होगा। इसके बाद जो घटनाक्रम सामने आए, वे इस दिशा में उठाए गए कदमों की तरह दिखाई देते हैं।
पहला कदम था मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और विधायक अरविंद पांडेय के बीच लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक खींचतान को कम करने का प्रयास। जिस विवाद ने पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असहजता पैदा कर दी थी, उसे सार्वजनिक रूप से शांत कराया गया और दोनों नेताओं को एक मंच पर खड़ा कर गमला भेंट करती जबरदस्ती हंसती फोटो खिंचवाकर एकता का संदेश देने की कोशिश हुई।
अब दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण कदम सामने आया है— विवादित अजय कुमार का उत्तराखंड से जाना।
संगठन महामंत्री का पद भाजपा में केवल प्रशासनिक नहीं होता, बल्कि सरकार और संगठन के बीच सबसे प्रभावशाली सेतु माना जाता है। ऐसे में किसी संगठन महामंत्री का स्थानांतरण अक्सर राजनीतिक संदेश भी देता है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड भाजपा मे अजय कुमार ने जिस प्रकार निकाय से लेकर पंचायत और संघटन से लेकर दायित्वधारियों के पद और टिकट वितरण का खेल खेला उससे नेताओं के बीच समन्वय और संगठनात्मक फैसलों को लेकर समय-समय पर असंतोष की आवाजें उठती रही हैं। मतलब भाजपा का कोई भी टिकट तब तक फाइनल नहीं होता था जब तक टिकट मांगने वाला या दायित्व मांगने वाला व्यक्ति अजय कुमार के रेस कोर्स आवास मे माथा टेककर नहीं आता था. भाजपा के सर्वे मे यह निकल कर आया कि सरकार और संगठन के बीच तालमेल उतना सहज नहीं है जितना दिखाई देता है।
यही कारण है कि अजय कुमार की विदाई को केवल नियमित बदलाव बताकर राजनीतिक चर्चा को रोका नहीं जा सकता। सवाल यह उठ रहा है कि यदि सब कुछ संतोषजनक था तो चुनाव से पहले इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वाले पद पर बदलाव की जरूरत क्यों महसूस हुई?
भाजपा नेतृत्व शायद यह संदेश देना चाहता है कि उत्तराखंड में एंटी-इनकंबेंसी का मुकाबला केवल प्रचार से नहीं बल्कि संगठनात्मक सुधारों से किया जाएगा। पार्टी यह भी समझती है कि विपक्ष से ज्यादा नुकसान आंतरिक असंतोष पहुंचा सकता है। इसलिए पहले नेताओं के बीच दूरी कम करने और फिर संगठन में बदलाव का रास्ता चुना गया।
हालांकि भाजपा इसे सामान्य प्रक्रिया बताएगी, लेकिन राजनीति में समय सबसे बड़ा संकेत होता है। जब एंटी-इनकंबेंसी पर चर्चा हो, नेताओं के बीच मतभेदों को सुलझाया जा रहा हो और उसी दौरान महामंत्री संगठन महामंत्री बदल दिया जाए, तो यह मानना कठिन है कि दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध नहीं है।
अब असली परीक्षा नए संगठनात्मक नेतृत्व की होगी। यदि आने वाले महीनों में कार्यकर्ताओं की नाराजगी कम होती है, गुटबाजी नियंत्रित होती है और सरकार के प्रति जनता का भरोसा मजबूत होता है, तो भाजपा इस बदलाव को सफल बताएगी। लेकिन यदि असंतोष जस का तस बना रहा, तो सवाल केवल अजय कुमार पर नहीं बल्कि उस पूरी रणनीति पर उठेंगे जिसके तहत एंटी-इनकंबेंसी का इलाज खोजने की कोशिश की जा रही है।
उत्तराखंड भाजपा में फिलहाल संदेश साफ है—2027 की तैयारी शुरू हो चुकी है, और पार्टी नेतृत्व अब यह जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रहा कि किसी भी स्तर पर जमा असंतोष चुनावी चुनौती में बदल जाए। बहुत कम लोगों को याद होगा कि अजय कुमार को उत्तराखंड का यह प्रभार उनसे पहले के महामंत्री संगठन संजय कुमार के रंगरेलियां में फंसने के कारण हटाने के बाद ही मिला था.
अजय कुमार की विदाई के बाद अब सबकी नजर उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम पर है कि उनकी विदाई मतलब उत्तराखंड से ‘निप्लटा”कब होगा..

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