अदालत ने कहा कि पारंपरिक रूप से बधाई या ‘नेग’ मांगना कोई कानूनी अधिकार नहीं है और इसे मौलिक अधिकार के रूप में भी मान्यता नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी माना कि यदि ऐसी प्रथाओं को वैध ठहराया गया, तो इससे अवैध वसूली और आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
लंबे समय से चली आ रही सामाजिक परंपराओं और आधुनिक कानूनी व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने किन्नर (ट्रांसजेंडर) समुदाय से जुड़े एक मामले में स्पष्ट रुख अपनाया है।

