वर्ष 1957 में जब अटल बिहारी वाजपेयी 33 वर्ष की आयु में बलरामपुर से द्वितीय लोकसभा के सदस्य चुने गए, तब से लेकर वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की शहादत तक, भारतीय संसद ने वैचारिक मतभेदों के बीच अगाध व्यक्तिगत सम्मान की एक अभूतपूर्व मिसाल देखी।
वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब 16 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के समक्ष 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश का निर्माण हुआ, तब विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने 17 दिसंबर 1971 को संसद में खड़े होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साहसिक नेतृत्व की खुलकर सराहना की थी।
वर्ष 1977 में जब छठी लोकसभा चुनाव के बाद जनसंघ और जनता पार्टी गठबंधन की सरकार बनी और 26 मार्च 1977 को अटल बिहारी वाजपेयी ने विदेश मंत्री का पदभार संभाला, तब साउथ ब्लॉक कार्यालय पहुँचने पर उन्होंने देखा कि दीवार से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तस्वीर हटा दी गई है।
वाजपेयी जी ने तुरंत 1 अधिकारी को निर्देश देकर वह तस्वीर उसी स्थान पर सम्मानपूर्वक वापस लगवाई, जो यह दर्शाता था कि राजनीतिक विरोध 100% नीतिगत था, व्यक्तिगत रंजिश शून्य थी।
वर्ष 1988 में जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी देश के नेता थे, तब राज्यसभा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी गुर्दे (किडनी) की गंभीर बीमारी से पीड़ित थे और वर्ष 1985 में अपनी 1 किडनी गंवा चुके थे।
24 मार्च 1988 के आसपास जब राजीव गांधी को इसका पता चला, तो उन्होंने 1 विशेष निर्णय लेते हुए वाजपेयी जी को न्यूयॉर्क जाने वाले संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के 1 औपचारिक भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया, ताकि वे अमेरिका जाकर अपना इलाज करा सकें।
वर्ष 1994 में जब 1 प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संकट के दौरान पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNCHR) जेनेवा में भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाया, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने 1 विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत के प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर जेनेवा भेजा था।
1 विपक्षी नेता द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने के कारण भारत ने 100% रणनीतिक सफलता हासिल की और पाकिस्तान को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा था।
इसके ठीक विपरीत, वर्ष 2014 से 2026 के बीच के आधुनिक राजनीतिक घटनाक्रमों का विश्लेषण करें, तो नीतिगत फैसलों से पूर्व विपक्ष को भरोसे में लेने की 50 साल पुरानी संसदीय परंपराओं में भारी बदलाव देखा गया है।
8 नवंबर 2016 को रात्रि 8:00 बजे जब ₹500 और ₹1000 के नोटों की नोटबंदी का निर्णय लिया गया, तब 130 करोड़ जनता और संपूर्ण विपक्ष को बिना किसी पूर्व सूचना या संसदीय बहस के अचानक इस फैसले का सामना करना पड़ा।
वर्ष 2020 में संसद में पास किए गए 3 कृषि कानूनों के मामले में भी व्यापक संसदीय बहस और विपक्षी सहमति का अभाव रहा, जिसके परिणामस्वरूप 378 दिनों तक चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के बाद 19 नवंबर 2021 को सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े थे।
यदि 1970 और 1980 के दशक की तरह सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष को भरोसे में लिया गया होता, तो देश को 1 वर्ष से अधिक चले विरोध और गतिरोध का सामना न करना पड़ता।
लोकतंत्र की वास्तविक ताकत 100% सत्ता के एकाधिकार में नहीं, बल्कि 100% लोकतांत्रिक शिष्टाचार और सर्वसम्मति में निहित होती है, जैसा कि वाजपेयी, इंदिरा और राजीव गांधी के दौर में देखा गया था।

