शहरी विकास विभाग में कुछ “पट्टाधारी” अफसरों के भी गजब के कारनामें हैं। प्रदेश में सुशासन के ढोल तो खूब पीटे जा रहे हैं लेकिन हकीकत ये है कि उत्तराखंड के शहरी विकास विभाग में कुछ अफसरों को कुर्सी का “स्थायी पट्टा” मिल चुका है। 10-10 वर्षों से एक ही निकाय में जमे हुए हैं।
तबादला आदेश आ जाए तो भी यह “पट्टाधारी” ज्वाइन नहीं करते। नेताओं से सेटिंग ऐसी कि नियमों को लगातार धता बताते आ रहे हैं। लंबे समय तक ट्रांसफर न होने की असली जिम्मेदारी निदेशालय में बैठे एक “कालिया” की है। यही “कालिया” है जो पहुँच वाले अफसरों को एक जगह जमाए रखने का “इंतजाम” करता है। आम कर्मचारियों के तबादले तो धड़ाधड़ हो जाते हैं किंतु जिनकी सांठ-गांठ मजबूत है, उनके लिए निदेशालय में बैठा यह “कालिया” दीवार बन जाता है। खास तौर पर पिथौरागढ़ वाले राजदेव जायसी साहब का किस्सा तो और भी दिलचस्प है। इनका मूल पद “कर निर्धारण अधिकारी” का है यानी कि टैक्स संवर्ग के अधिकारी हैं। लेकिन इन्होंने शासन में सांठ-गांठ करके “लेखाधिकारी” का पद हथिया लिया है जो लेखा संवर्ग का पद होता है। एक संवर्ग से दूसरे संवर्ग में कैसे छलांग लगाई गई ? ये किसी को नहीं पता। कहीं ये मंशा तो नहीं थी कि “वित्तीय शक्तियां” हाथ में आ जाएं? लेखाधिकारी रहते हुए इन्होंने कितनी-कितनी धनराशि के चेक साइन किए होंगे, ये भी जांच का विषय होना चाहिए। जो आम कर्मचारी हैं, उनको साल में दो-दो बार ट्रांसफर की मार झेलनी पड़ रही है। और जो “पहुंच वाले” हैं, उनके लिए तो विभाग ने कुर्सी पर ताला लगा दिया है। पिथौरागढ़ से हल्द्वानी, देहरादून से मसूरी, हरिद्वार से रुद्रप्रयाग…हर जगह ये “पट्टाधारी” अधिकारी गड़बड़ियों के साथ लंबे समय से जमे हुए हैं। बिना स्वीकृत पदों के काम कर रहे हैं, अवैध प्रभार ले रहे हैं और विभाग की स्थानांतरण नीति का मजाक बना रहे हैं। भ्रष्टाचार की बू तो आ ही रही है, अब सवाल ये है कि क्या कभी इन की निष्पक्ष जांच होगी? या फिर निदेशालय में बैठा ये “कालिया” इन्हें हमेशा बचाता रहेगा? हम पिछले कुछ समय से शहरी विकास विभाग पर “शोधकार्य” कर रहे हैं यदि कोई भी इनकी सच्चाई जानते हों तो हमें अवश्य बताएं कि क्या ये सब सिर्फ कागजों में “सुशासन” है ?
जब तक तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं।✊

