उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल जी ने उत्तर प्रदेश के ब्यूरोक्रेसी पर एक बार फिर उठे सवाल

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने बेटियों को स्कूटी देने में हुई देरी पर उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) एमपी अग्रवाल को जिम्मेदारी ठहराया। कहा- ये फाइल को इधर से उधर घुमाते हैं।


भास्कर की रिपोर्ट अनुसार राज्यपाल के इन तीखे तेवरों के बाद योगी सरकार के प्रोजेक्ट्स की पड़ताल की। जो अफसरों की लेटलतीफी या आपसी खींचतान के कारण या तो शुरू नहीं हो पाए या अधर में लटके हैं। विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे विधायकों को इन प्रोजेक्ट की लेटलतीफी पर लोगों को समझाना होगा।
घोषणा : भाजपा ने 2022 के संकल्प पत्र में मेधावी छात्राओं को स्कूटी देने का वादा किया था। बजट 2025-26 में इसके लिए 400 करोड़ रुपए बजट भी रखा गया।
ब्यूरोक्रेसी का अड़ंगा : अफसरों ने एक साल तक योजना की नियमावली ही नहीं बनाई। अब जब बनाई, तो उसमें 90% अंक की अनिवार्य शर्त रख दी।
असर : राज्यपाल ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इस नियम से सिर्फ शहरों की उन बेटियों को फायदा होगा, जो प्राइवेट स्कूलों और ट्यूशन में पढ़ती हैं। गांव की बेटियां, जिन्हें 10-12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, वे इस योजना से वंचित रह जाएंगी।
प्रोजेक्ट : यूपी के 49 बस स्टैंड को PPP (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड पर आधुनिक रूप से विकसित किया जाना है।
ब्यूरोक्रेसी का अड़ंगा : नियम के मुताबिक, टेंडर दाखिल होने के अगले दिन ही खुल जाने चाहिए। लेकिन, विभाग की अपर मुख्य सचिव अर्चना अग्रवाल और परिवहन निगम के एमडी पीएन सिंह के बीच चल रही आपसी खींचतान के चलते पहले चरण के टेंडर एक महीने और दूसरे चरण के टेंडर 11 दिन से दबे पड़े हैं।
असर : विभागीय मंत्री दयाशंकर सिंह की बैठक के बाद भी फाइल आगे नहीं बढ़ी। चुनाव नजदीक देख विधायक चाहते हैं कि उनके क्षेत्र में काम जल्दी शुरू हो जाए। कौशल विकास मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने तो इस संबंध में सरकार को पत्र भी लिखा है।
वादा : 5 साल में 2 करोड़ छात्रों को स्मार्टफोन/टैबलेट देने का लक्ष्य था। बजट 2025-26 में 40 लाख छात्रों के लिए 2,374 करोड़ रुपए आवंटित किए गए।
ब्यूरोक्रेसी का अड़ंगा : नियमावली बनाने से लेकर टेंडर प्रक्रिया में इतनी देरी हुई कि 4 साल में सिर्फ 60 लाख गैजेट्स ही बांटे जा सके। नोडल एजेंसी यूपीडेस्को और औद्योगिक विकास विभाग अब भी टेंडर और नेगोशिएशन (सौदेबाजी) के फेर में उलझे हैं।
असर : चुनाव से पहले विधायक चाहते हैं कि उनके हाथों से 18 साल से ऊपर के युवाओं को टैबलेट मिलें, जिससे चुनाव में इसका सीधा फायदा हो। लेकिन, कंपनियों द्वारा इतनी बड़ी सप्लाई में अब समय लगना तय है।
घोषणा : 2025 के बजट के बाद सीएम योगी ने आउटसोर्स कर्मियों का न्यूनतम मानदेय 16 हजार रुपए करने और उनके लिए ‘आउटसोर्स सेवा निगम’ बनाने की घोषणा की थी। सितंबर, 2025 में शासनादेश जारी कर आईएएस अमृता सोनी को इसका एमडी बनाया गया था।
ब्यूरोक्रेसी का अड़ंगा : निगम बने और एमडी की तैनाती हुए करीब एक साल बीत चुका है, लेकिन इस निगम के जरिए अभी तक एक भी भर्ती शुरू नहीं हो सकी है।
असर : कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, पीएफ कटौती और ग्रेच्युटी को लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं है। प्रदेश के 3 लाख से अधिक आउटसोर्स कर्मचारी मानदेय बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं।
• यूपी स्टार्टअप मिशन : जुलाई, 2024 में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री सुनील शर्मा ने ‘यूपी स्टार्टअप मिशन’ के निर्देश दिए थे। 2 साल तक फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल पर घूमती रही। हाल ही में कैबिनेट से मंजूरी तो मिली, लेकिन मिशन कब शुरू होगा, कोई नहीं जानता। वहीं, ब्लॉक और ग्राम पंचायतों को हाई-स्पीड डिजिटल कनेक्टिविटी देने वाला स्वान-3 प्रोजेक्ट भी ACS आलोक कुमार के स्तर पर गति नहीं पकड़ पा रहा है।
• फैमिली आईडी योजना : ‘एक परिवार-एक पहचान’ के जरिए हर परिवार के कम से कम एक सदस्य को रोजगार देने का वादा था। लेकिन, ब्यूरोक्रेसी की लेटलतीफी के कारण यह योजना अभी तक कागजों से बाहर नहीं आ पाई है।
• लेबर अड्‌डा योजना : सरकार ने 2025 के बजट में सभी 75 जिलों में निर्माण श्रमिकों के लिए ‘लेबर अड्डा’ बनाने की घोषणा की थी। सवा साल बाद भी यह सिर्फ लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद जैसे 6 बड़े शहरों तक सीमित है। बाकी 69 जिले अब भी अछूते हैं।
• ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी : फरवरी, 2024 में पहली ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के बाद निवेशक दूसरी सेरेमनी का इंतजार कर रहे हैं। इन्वेस्ट यूपी और औद्योगिक विकास विभाग की सुस्ती पर जब एसीएस आलोक कुमार से पूछा गया, तो उनका कहना था कि विभाग तैयार है। जब सीएम समय देंगे, तब कार्यक्रम होगा।

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