माननीय उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द पर हुए जघन्य हमले के प्रकरण में निचली अदालत एवं पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश निरस्त किए — तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत एवं उनके गनर देवेन्द्र कठैत के विरुद्ध शिकायत प्रकरण पुनः आदेश पारित करने हेतु ट्रायल कोर्ट भेजा गया ***
हरिद्वार, 13 जुलाई 2026
एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में माननीय उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 से लंबित उस शिकायत वाद में आवश्यक हस्तक्षेप करते हुए ट्रायल कोर्ट तथा पुनरीक्षण न्यायालय—दोनों के आदेशों को निरस्त (Set Aside) कर दिया है। माननीय उच्च न्यायालय ने दोनों न्यायालयों के आदेशों को विकृत पाते हुए प्रकरण को पुनः ट्रायल कोर्ट को विधि के अनुसार आदेश पारित करने हेतु वापस भेज दिया है।
यह मामला 25 दिसम्बर 2017 को ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज, हरिद्वार में आयोजित एक समारोह से संबंधित है, जिसमें तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत को “महामना मदन मोहन मालवीय सम्मान” प्रदान किया जा रहा था।
मातृसदन के ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द जी को जब इस समारोह की जानकारी एक पम्पलेट से प्राप्त हुई, तब उन्होंने यह प्रश्न उठाने का निर्णय लिया कि जिन महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी का सम्पूर्ण जीवन सत्य, राष्ट्रसेवा, नैतिकता एवं लोककल्याण के आदर्शों के लिए समर्पित था, उनके नाम पर ऐसा सम्मान ऐसे व्यक्ति को किस आधार पर दिया जा रहा है, जिसके विरुद्ध गंगा में अवैध एवं विनाशकारी खनन को संरक्षण देने, संतों के विरुद्ध हत्या का षड्यन्त्र करवाने तथा खनन माफियाओं को प्रशासनिक संरक्षण प्रदान करने के गंभीर आरोप लंबे समय से उठते रहे हैं।
तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत ने ही पूर्व में ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द जी को आश्रम से बलपूर्वक उठवाकर अस्पताल में भर्ती कराया था, जहाँ उनकी हत्या की गंभीर साजिश रची गई थी। उस समय तत्कालीन एस.डी.एम. मनीष कुमार सिंह इन अवैध आदेशों के क्रियान्वयन में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द जी किसी प्रकार इस कथित षड्यंत्र से बच निकले, किन्तु इसके पश्चात वर्ष 2018 में तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत एवं तत्कालीन एस.डी.एम. मनीष कुमार सिंह ने इसी प्रकार के एक और गंभीर षड्यंत्र को अंजाम दिया। दीपक रावत के निर्देश पर मनीष कुमार सिंह ने बतौर परगना मैजिस्ट्रैट अनशन पर बैठे स्वामी सानन्द जी को स्वस्थ्य अवस्था में मातृ सदन आश्रम से बलपूर्वक उठवाकर अस्पताल में भर्ती कराया, जिसके अगले ही दिन, 11 अक्टूबर 2018, उनकी मृत्यु हो गई। यह एक सुनियोजित हत्या थी, जिसके लिए दोनों अधिकारी जिम्मेदार हैं।
बहरहाल, उक्त समारोह में जैसे ही दीपक रावत के सम्मान की घोषणा हुई, ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द जी ने शांतिपूर्ण ढंग से इस सम्मान पर प्रश्न उठाया तथा उपस्थित लोगों के बीच पम्पलेट वितरित करने प्रारम्भ किए। लेकिन इसके तुरंत बाद दीपक रावत ने समारोह की समस्त रिकॉर्डिंग बंद करने का आदेश दिया। उनके गनर देवेन्द्र कठैत ने ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द जी को पकड़ लिया तथा दीपक रावत स्वयं उन्हें स्टेज के पीछे एक वी.आई.पी. कक्ष में ले गए। दीपक रावत ने वहाँ उनके साथ अत्यन्त क्रूर, अमानवीय एवं बर्बर मारपीट की। उनके जनेऊ से उनका गला घोंटने का प्रयास किया गया, जनेऊ को जूतों से रौंदा गया व धार्मिक अपशब्द कहे, उनके गुप्तांगों पर गंभीर प्रहार किए गए तथा उनकी हत्या का प्रयास किया गया। लगभग पन्द्रह मिनट तक चले इस निर्मम हमले के बाद गनर देवेन्द्र कठैत ने भी उनके साथ गंभीर मारपीट की।
यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं थी, बल्कि यह शांतिपूर्ण विरोध, धार्मिक गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा विधि के शासन पर सीधा और गंभीर आघात था।
इस पूरे प्रकरण का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त अभिलेखों के अनुसार, तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत को उक्त निजी सम्मान समारोह में सम्मिलित होने की कोई आधिकारिक अनुमति प्राप्त नहीं थी।
घटना के उपरान्त, हमले के आरोपियों के विरुद्ध तत्काल कार्यवाही करने के स्थान पर स्वयं ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द जी को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। उनका चिकित्सीय परीक्षण कराया गया तथा उन्हें जेल भेज दिया गया, जहाँ से दो दिन बाद उनकी रिहाई हुई। चिकित्सीय अभिलेखों के अनुसार 27 दिसम्बर 2017 तक भी उनके शरीर पर गंभीर चोटों के चिन्ह विद्यमान थे, जो हमले की गंभीरता को दर्शाते हैं।
मातृसदन द्वारा दीपक रावत एवं देवेन्द्र कठैत के विरुद्ध दायर शिकायत वाद को ट्रायल कोर्ट ने 19 सितम्बर 2023 को अत्यन्त संक्षिप्त एवं असंतोषजनक आदेश द्वारा खारिज कर दिया। इसके विरुद्ध दायर पुनरीक्षण याचिका को भी 18 फरवरी 2026 को अस्वीकार कर दिया गया। पुनरीक्षण न्यायालय में दीपक रावत ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से शिकायत का प्रबल विरोध किया। किन्तु अब माननीय उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने दोनों न्यायालयों के आदेशों को विधिसम्मत न मानते हुए उन्हें निरस्त कर दिया है तथा महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ करते हुए मामले को पुनः ट्रायल कोर्ट को भेज दिया है।
मातृसदन का मानना है कि यह आदेश केवल एक शिकायतकर्ता को न्याय मिलने की शुरुआत नहीं, बल्कि न्यायिक उत्तरदायित्व, विधि के शासन तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम है।
मातृसदन का यह भी कहना है कि शिकायत में वर्णित आरोप सत्य सिद्ध होते ही तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत का आचरण किसी भी संवैधानिक पद की गरिमा के पूर्णतः प्रतिकूल, सत्ता के घोर दुरुपयोग का उदाहरण तथा लोकतांत्रिक मूल्यों पर कलंक माना जाएगा।
मातृसदन को विश्वास है कि अब ट्रायल कोर्ट माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों के आलोक में उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष परीक्षण करेगा तथा दोषी व्यक्तियों को विधि के अनुसार न्याय के कटघरे तक पहुँचाया जाएगा।

