परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती 75 वे अवतर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं गंगा न्यूज़ 24 की और से
देवभूमि उत्तराखण्ड स्थित ऋषिकेश की पुण्यभूमि, भागीरथी माँ गंगा के पावन तट तथा भारतीय अध्यात्म की अनादि परम्परा के दिव्य आलोक से आलोकित “परमार्थ निकेतन” के परमाध्यक्ष, पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द सरस्वती “मुनिजी” महाराज का व्यक्तित्व आधुनिक युग में भारतीय सनातन संस्कृति के जीवंत प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित है। उनका जीवन केवल एक सन्त का जीवन नहीं, अपितु सेवा, साधना, संस्कार, समर्पण और सार्वभौम सद्भावना का एक विराट आध्यात्मिक अभियान है। वे भारतीय अध्यात्म की उस महान परम्परा के तेजस्वी संवाहक हैं, जिसने सदैव समस्त मानवता को प्रेम, करुणा, शान्ति और आत्मबोध का सन्देश दिया है।

पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज ने अपने तप, त्याग, पुरुषार्थ और करुणा से न केवल भारत, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सनातन संस्कृति की दिव्य चेतना को प्रतिष्ठित किया है। उनका जीवन “वसुधैव कुटुम्बकम्” की ऋषि-दृष्टि का सजीव स्वरूप है। उन्होंने अध्यात्म को केवल मंदिरों तक सीमित न रखकर उसे मानव-कल्याण, पर्यावरण-संरक्षण, सेवा, शिक्षा, संस्कार और वैश्विक शान्ति से जोड़ा। गंगा-स्वच्छता अभियान, जल-संरक्षण, वृक्षारोपण, योग-जागरण, नारी-सशक्तिकरण तथा पर्यावरण-चेतना के क्षेत्र में उनका योगदान अद्वितीय और प्रेरणादायी है।
“परमार्थ निकेतन” के माध्यम से उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को यह सन्देश दिया कि अध्यात्म केवल ध्यान या उपासना नहीं, बल्कि प्रकृति, मानवता और समस्त सृष्टि के प्रति संवेदनशीलता का नाम है। उनके मार्गदर्शन में परमार्थ निकेतन आज विश्वस्तर पर अध्यात्म, योग, सेवा और संस्कृति का एक महान केन्द्र बन चुका है, जहाँ भारत की ऋषि-परम्परा का दिव्य प्रकाश विश्व के कोने-कोने तक पहुँच रहा है। उनके स्नेहिल व्यक्तित्व में सन्त की करुणा, ऋषि की दूरदृष्टि, गुरु की आत्मीयता और राष्ट्रऋषि की व्यापक चेतना का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है।

परमपूज्य वंदनीय श्री स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन “७५वें अवतरण दिवस” का भव्य एवं गरिमामय आयोजन परम पूज्य श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” की अध्यक्षता में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक गरिमा के मध्य सम्पन्न हुआ। इस दिव्य आयोजन का संचालन विश्वविख्यात पतंजलि योगपीठ के संस्थापक योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने किया।
इस पावन अवसर पर वात्सल्यमूर्ति, सनातन धर्म-संस्कृति की सबल संरक्षिका पूज्या दीदी माँ ऋतम्भरा जी, गीता मनीषी महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज, संत शिरोमणि परम पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी हरिचेतनानन्द जी महाराज, पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के प्रमुख आदरणीय पूज्य श्री स्वामी रवीन्द्रपुरी जी महाराज, गोसेवा एवं लोकसेवा के अप्रतिम प्रकल्पों के प्रेरणास्रोत परम पूज्य श्री स्वामी ईश्वरदास जी महाराज, वन्दनीया माँ साध्वी भगवती जी, लोकप्रसिद्ध रससिद्ध कथावाचक पूज्य मुरलीधर जी सहित भारत तथा अनेक देशों से पधारी गणमान्य विभूतियाँ उपस्थित रहीं। समस्त वातावरण वैदिक मंत्रोच्चार, संत-सान्निध्य, आध्यात्मिक ऊर्जा और गंगा-तट की दिव्य पवित्रता से अनुप्राणित हो उठा।
विशेष रूप से यह अवतरण-दिवस समारोह पर्यावरण-संरक्षण और प्रकृति-जागरण के निमित्त समर्पित रहा। यह अत्यंत सार्थक एवं प्रेरणादायी तथ्य है कि पूज्य संत चिदानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने जन्मोत्सव को भी लोकमंगल और प्रकृति-संरक्षण की भावना से जोड़ दिया। इस अवसर पर उपस्थित संतों, विद्वानों एवं गणमान्य अतिथियों ने जल-संरक्षण, गंगा-स्वच्छता, पर्यावरण-चेतना तथा मानवता के भविष्य को सुरक्षित रखने के विषय में प्रभावी उद्बोधन दिए। परमार्थ निकेतन घाट पर आयोजित इस भव्य समारोह में अनेक देशों से आए श्रद्धालुओं, योग-साधकों एवं भक्तों ने सहभागिता कर इसे वैश्विक आध्यात्मिक एकता का अनुपम उत्सव बना दिया।
आज जब विश्व भौतिकता, अशांति, पर्यावरण संकट और सांस्कृतिक विघटन की चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे समय में पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती जी महाराज का जीवन सम्पूर्ण मानवता के लिए आशा, संतुलन, संवेदना और आध्यात्मिक जागरण का दिव्य संदेश है। उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा अध्यात्म वही है, जो मानवता को जोड़ता है, प्रकृति की रक्षा करता है और जीवन को करुणा, सेवा तथा आत्मबोध से आलोकित करता है।
उनके पावन “७५वें जन्म-अवतरण दिवस” पर हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि पूज्य मुनि जी का जीवन दीर्घ, स्वस्थ, यशस्वी और लोकमंगलकारी बना रहे। उनका दिव्य सान्निध्य, प्रेरणादायी मार्गदर्शन और सेवा-यात्रा युगों-युगों तक समाज, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती रहे; यही मंगलकामना है !
शुभम् भवतु !

