ये राममनोहर लोहिया रचनावली : 9 (विचार और टिप्पणियां) की किताब है। इसमें 3 लेख हैं जो अगस्त 1967 में लिखे गए थे:

76. साज-सामान : प्राण और आत्मा (पेज 418-419)
भारत की संसद ने सारा साज-सामान ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स से ले लिया लेकिन प्राण और आत्मा को छोड़ दिया। लोहिया लिखते हैं कि भारत में सच और झूठ की विभाजक रेखा धुंधली है, शासक पार्टी के सदस्य कठोर चुगली बनाए रखते हैं। इंग्लैंड में मंत्री झूठ बोलते पकड़ा जाए तो पद छोड़ देता है, भारत में नहीं। आखिर में लिखा है – आखिर सतत चौकसी ही आजादी की कीमत है और जनता को संसद और उसके सदस्यों पर हमेशा चौकसी बनाए रखनी चाहिए।

*77. स्वेतलाना और लोक सभा
स्टालिन की बेटी स्वेतलाना के भारत में रहने को लेकर विवाद। दि टाइम्स, लंदन से भेजी गई कतरनों के हवाले से लिखा है कि स्वेतलाना ने डॉ. लोहिया को पत्र लिखा था। विदेश मंत्री छागला और दिनेश सिंह पर सदन को गुमराह करने का आरोप। विपक्ष ने विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखा जो 100 से ज्यादा मतों से गिर गया।
78. रानी के आदमी (पेज 423-424)
तीसरी लोक सभा के अंतिम सत्रों में भ्रष्टाचार के मामले – अमरचंद प्यारेलाल घोटाला, ए.पी.जे. शिपिंग घोटाला, मिंक कोट और हीरों के हार का घोटाला। लोहिया लिखते हैं कि प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी) के इशारे पर उनके समर्थक सांसद उन्हें “मारवाड़ी सूदखोर का बच्चा” जैसे विशेषणों से हमला करते
ये रहा अध्याय 77 – स्वेतलाना और लोक सभा 👇
स्टालिन की बेटी स्वेतलाना का भारत प्रवास 1967 में भारत सरकार के लिए घरेलू परेशानी बन गया था। स्विट्जरलैंड से लिखे एक पत्र में जो सोशलिस्ट नेता डॉ. राममनोहर लोहिया को भेजा गया था, स्वेतलाना ने लिखा था कि उसने दिनेश सिंह (जिनके यहां वह भारत में ठहरी थीं और जो विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री थे) से ‘शेष जीवन भारत में बिताने की संभावना’ के बारे में पूछा था और जवाब मिला था कि ‘सोवियत सरकार विरोध करेगी इसलिए असंभव होगा।’
लोहिया ने इस पत्र को आधार बनाकर 21 मार्च को लोक सभा में सवाल उठाया कि विदेश मंत्री छागला ने सदन को गुमराह किया है जब उन्होंने कहा था कि स्वेतलाना ने भारत में ठहरने का कोई अनुरोध नहीं किया।

लोहिया ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, विदेश मंत्री छागला और वाणिज्य मंत्री दिनेश सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव की अनुमति मांगी। सरकार की तरफ से पत्र की प्रामाणिकता पर सवाल नहीं उठाया गया लेकिन निहितार्थों को नजरअंदाज कर दिया गया। बाद में यह प्रस्ताव 100 से ज्यादा मतों के बहुमत से गिर गया।
स्रोत: दि टाइम्स, लंदन, 5 अप्रैल 1967 – लोहिया रचनावली में उद्धृत

