मंडल कमीशन के आने के बाद राजनीतिकरण हुआ और आरक्षण को आगे बढ़ाया गया आज उसी का नतीजा है कि आरक्षण के कारण पूरे देश में आकर मचाए यह आरक्षण पूर्ण रूप से लागू नहीं होना चाहिए
कर्पूरी ठाकुर के CM बन जाने के बावजूद उनके पिताजी हजामत बनाने का काम करते थे। एक दिन गाँव के दबंग के यहाँ से उन्हें हजामत का बुलावा आया। किसी कारणवश देर हो गई तो उस दबंग ने कर्पूरी के घर आकर उनके पिता के साथ हाथापाई कर दी।
जब यह खबर पटना पहुंची तो प्रशासन के हाथ पाँव फूल गए। भारी कार्रवाई की तैयारी होने लगी। आख़िर सिटिंग CM के पिताजी का मामला था। कर्पूरी ने प्रशासन को रोक दिया। कहा कि मेरे पिता एकमात्र इस समस्या से पीड़ित नहीं हैं। यह पूरे प्रदेश के गरीबों और सत्ता के असंतुलन की समस्या है। गरीबों में सत्ता के बंटवारे से ही यह संभव हो सकता है।
उन्होंने पहली बार 26% आरक्षण का कर्पूरी फार्मूला दिया। जिसमें 12% पिछड़ों को, 8% अतिपिछड़ों को, 3% महिलाओं को और 3% सवर्ण गरीबों को दिया था।
मंडल कमीशन इसके ठीक उलट रहा। उसका निशाना ग़रीबी और सत्ता में असंतुलन नहीं बल्कि पिछड़े वर्ग की एक दो जातियों के राजनैतिक हित साधने की व्यवस्था थी। जो उसके लागू होने के 35 साल बाद प्रत्यक्ष रूप से चारों ओर दिख रहा है। एक दो जातियां असमान रूप से आगे बढ़ गई हैं और बाक़ी सब पीछे छूट गई हैं।
और यह बढ़ी हुई जातियां अपना वर्चस्व बचाए रखने के लिए किसी भी तरह के कुकर्म करने को तैयार हैं।
इसको बदलने का समय आ गया है।
#रोहिणीकमीशनलागू_करो

