मातृ सदन, जगजीतपुर, कनखल, हरिद्वार द्वारा आज एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में गंगा संरक्षण और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर चल रही सुनवाई में केंद्र सरकार, विशेषकर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के ढुलमुल और गैर-जिम्मेदाराना रवैये से नाराज मातृ सदन,

मातृ सदन, जगजीतपुर, कनखल, हरिद्वार द्वारा आज एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में गंगा संरक्षण और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर चल रही सुनवाई में केंद्र सरकार, विशेषकर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के ढुलमुल और गैर-जिम्मेदाराना रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की गई है। मातृ सदन ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 20 जनवरी 2026 की तारीख तय की गई थी, लेकिन मंत्रालय ने समय पर जवाब न देकर न्यायालय की गरिमा और मामले की गंभीरता की पूरी तरह उपेक्षा की। इसके बाद, जब सुनवाई की अंतिम तिथि 20 मई 2026 नियत थी, तब मंत्रालय ने ठीक एक दिन पहले यानी 19 मई 2026 को अपना संयुक्त हलफनामा दाखिल किया, जो उनकी घोर लापरवाही और टालमटोल की नीति को दर्शाता है।

आश्रम ने केंद्र सरकार पर ‘विश हंटिंग’ (मनमानी छानबीन) और ‘कमेटी राज’ चलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार केवल समय काटने के लिए एक के बाद एक नई कमेटियां गठित कर रही है, ताकि पूर्व की विशेषज्ञ समितियों की पर्यावरण-अनुकूल सिफारिशों को दबाया जा सके। मातृ सदन ने केंद्र सरकार के उस रुख का कड़ा विरोध किया है जिसमें अलकनंदा और भागीरथी बेसिन में नई परियोजनाओं पर रोक लगाने की बात तो कही गई है, लेकिन पूर्व की 7 जलविद्युत परियोजनाओं को केवल इसलिए हरी झंडी दे दी गई क्योंकि उन पर भारी वित्तीय खर्च हो चुका है। मातृ सदन का स्पष्ट कहना है कि केवल आर्थिक नुकसान या वित्तीय बोझ का हवाला देकर हिमालय और गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोलॉजी) को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। इन 7 परियोजनाओं को अनुमति देते समय वहां के नाजुक पर्यावरण, भूकंपीय खतरों और आपदाओं की पूरी तरह अनदेखी की गई है, जो बेहद खतरनाक है।

वर्ष 2013 में केदारनाथ की भीषण त्रासदी के बाद, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. रवि चोपड़ा जी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय Expert Body 1 का गठन किया था। इस समिति ने स्पष्ट रूप से अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उत्तराखंड के इस बेहद संवेदनशील इलाके में पाइपलाइन में मौजूद 23 परियोजनाओं सहित किसी भी नई जलविद्युत परियोजना को अनुमति न दी जाए। इस वैज्ञानिक और व्यावहारिक निष्कर्ष की पुष्टि देश के 7 प्रमुख आईआईटी (IITs) के कंसोर्टियम और डॉ. विनोद तारे समिति ने भी पुरजोर तरीके से की थी। लेकिन इसके बावजूद, पर्यावरण मंत्रालय (MoEF) ने चालाकी और मनमाने रवैये का परिचय देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के 12 मई 2015 के एक आदेश की गलत व्याख्या (आड़ लेकर) की, जबकि उस आदेश में न्यायालय ने कोई नई कमेटी बनाने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया था। इसके बावजूद मंत्रालय ने जबरन एक दूसरी विशेषज्ञ समिति (Expert Body 2) का गठन कर डाला और उसकी मदद से डॉ. रवि चोपड़ा समिति (EB-1) के जनहितैषी व पर्यावरण-अनुकूल निष्कर्षों को पूरी तरह से पलट दिया और 28 जलविद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया खबर के अनुसार, अब भारत सरकार इन्हीं में से 7 विवादास्पद परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर आमादा है। मातृ सदन सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज करता है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने नई जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण पर लगे अपने स्थगन आदेश (Stay) को कभी वापस नहीं लिया था। इसके बावजूद, सरकार ने न्यायालय के किसी भी कानूनी आदेश के बिना, तानाशाही रवैया अपनाते हुए इन 7 परियोजनाओं पर काम जारी रखा, जिनमें से लगभग 4 को पूरा कर लिया गया और 3 पर भारी काम कर दिया गया। बिना किसी अदालती मंजूरी के किया गया यह निर्माण न केवल न्यायपालिका की अवमानना है, बल्कि हिमालय के पर्यावरण के साथ एक बहुत बड़ा और जानबूझकर किया गया खिलवाड़ है।

गंगा की अविरलता, निर्मलता और पर्यावरण की रक्षा के लिए मातृ सदन प्रतिबद्ध है। मातृ सदन के संतों ने इसके लिए अनेक बलिदान दिए हैं। कल अदालत की कार्यवाही के दौरान, माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने विशेष रूप से यह दोहराया है कि वह इस मामले में “मातृ सदन को विस्तार से सुनेगी” (bench will hear Matri Sadan in detail)। मातृ सदन जल्द ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपना विस्तृत प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करेगी और उक्त के साथ साथ इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय नुकसानों को पुरजोर तरीके से उजागर करेगी।

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