यूपी सरकार ने प्रधानों के बाद पहली बार अब सभी मौजूदा 75 जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक बना दिया है। पंचायती राज विभाग ने शुक्रवार की शाम 7:30 बजे आदेश जारी कर दिया।
वही ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाये जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को जमकर फटकार लगाई थी।
पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बताया- जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल शनिवार, 11 जुलाई को समाप्त हो रहा था। इससे पहले सरकार ने उन्हें प्रशासक बना दिया है।
सामान्य तौर पर कार्यकाल खत्म होने के बाद जिलाधिकारी को प्रशासक बनाया जाता है, लेकिन सरकार के इस फैसले से अब ये अध्यक्ष आगामी पंचायत चुनाव होने तक अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे। ब्लॉक प्रमुखों को भी प्रशासन बनाया जाएगा, इसका भी आदेश जल्द जारी हो सकता है।
उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है जब निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्षों को ही कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रशासक के पद पर नियुक्त किया जा रहा है। हालांकि, तकनीकी और कानूनी पेच से बचने के लिए सरकार ने इनके अधिकारों पर थोड़ी बंदिशें जरूर लगाई हैं।
प्रशासक के रूप में ये अध्यक्ष कोई बड़ा ‘नीतिगत निर्णय’ नहीं ले पाएंगे, लेकिन जिला पंचायत के रोजमर्रा के सभी विकास कार्य, प्रशासनिक संचालन और योजनाएं पहले की तरह ही इनके हस्ताक्षर से चलती रहेंगी।
सरकार ने इस फैसल से तीन समीकरण साधे–
प्रदेश की कुल 75 जिला पंचायतों में से 68 सीटों पर वर्तमान में भाजपा समर्थित अध्यक्ष काबिज हैं। इस तरह भाजपा की पकड़ बनी रहेगी।
अगर इस पद पर नौकरशाह (DM) बैठते, तो जनप्रतिनिधियों का दखल शून्य हो जाता। अब भाजपा के ये 68 दिग्गज अपने-अपने जिलों में ‘पावर सेंटर’ बने रहेंगे।
आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह फैसला बेहद मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। ये अध्यक्ष ग्रामीण इलाकों में भाजपा के लिए जमीन मजबूत रखने और चुनावी बिसात बिछाने में सीधे मददगार साबित होंगे।
विकास कार्यों में न आए रुकावट: नौकरशाही के हाथ में कमान जाने से टेंडर प्रक्रिया और ग्रामीण विकास के काम सुस्त हो जाते हैं।
नेताओं की नाराजगी से बचाव: पंचायत चुनाव में देरी होने के कारण मौजूदा अध्यक्षों और उनके समर्थकों में अपनी पावर छिनने का डर था, जिसे सरकार ने दूर कर दिया।
प्रधानों के बाद अब अध्यक्षों को तोहफा: सरकार इससे पहले सूबे के 57 हजार से अधिक ग्राम प्रधानों को भी इसी तर्ज पर ‘प्रधान प्रशासक’ बना चुकी है।

