LADC प्रणाली का अंत: क्या भारत में विधिक सहायता व्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश कर रही है?
4 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा जारी एक पत्र ने देश की विधिक सहायता व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ ला दिया। इस पत्र के अनुसार, Legal Aid Defense Counsel System (LADCS) के अंतर्गत कार्यरत अधिवक्ताओं के अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में यह व्यवस्था सितंबर 2026 से समाप्त होगी, जबकि अन्य राज्यों में वर्तमान संविदा अवधि पूरी होने के बाद अनुबंध स्वतः समाप्त हो जाएंगे।
मेरा इस व्यवस्था से लभभग एक वर्ष छ: माह तक बतौर DLADC सीधा सम्बन्ध रहा है लेकिन वर्तमान में कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं है, क्योंकि मैं अप्रैल 2026 में ही अपने पद से त्यागपत्र दे चुका हूँ, तथा पद पर रहते हुए देखा है कि LADC व्यवस्था किस प्रकार से कार्य करती है, यह निर्णय सीधे तौर पर उन बंदियों को प्रभावित करेगा जिनकी अदालत में पैरवी करने वाला कोई नहीं है, यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्वतंत्र बार की भूमिका, समान अवसर और विधिक सहायता व्यवस्था के भविष्य
से जुड़ा हुआ है। अब अपेक्षा है कि नई व्यवस्था ऐसी हो जो गरीब वादकारियों को प्रभावी कानूनी सहायता भी दे और अधिवक्ताओं के बीच समान अवसर भी सुनिश्चित करे।
यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि उस प्रयोग की समीक्षा है, जिसे गरीब अभियुक्तों को बेहतर कानूनी सहायता देने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था।
LADC के माध्यम से नई प्रणाली का उदय- भारत का संविधान भारत के प्रत्येक नागरिक को समान न्याय का अधिकार देता है। अनुच्छेद 39(क) (39A) राज्य को निर्देश देता है कि आर्थिक या सामाजिक कमजोरी के कारण कोई भी व्यक्ति न्याय से वंचित न रहे। इसी संवैधानिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए NALSA ने Legal Aid Defense Counsel System प्रारंभ किया। इसका उद्देश्य था कि गरीब अभियुक्तों को ऐसे पूर्णकालिक अधिवक्ता उपलब्ध हों जो केवल विधिक सहायता के मामलों पर कार्य करें और मुकदमों की निरंतर निगरानी कर सकें। सिद्धांत रूप से यह विचार अत्यंत आकर्षक था, परंतु व्यवहार में अनेक समस्याएँ सामने आईं।
विरोध – LADC प्रणाली का सबसे बड़ा विरोध देश के विभिन्न बार एसोसिएशनों ने किया। उनका तर्क था कि यह व्यवस्था स्वतंत्र अधिवक्ताओं के लिए अवसरों को सीमित कर रही है। पहले विधिक सहायता के मुकदमे जिला बार के अनेक अधिवक्ताओं को मिलते थे। इससे युवा अधिवक्ताओं को अनुभव भी मिलता था और आय का एक स्रोत भी उपलब्ध रहता था। LADC लागू होने के बाद अधिकांश मामले कुछ निश्चित वेतनभोगी अधिवक्ताओं तक सीमित हो गए। बार संगठनों ने यह भी कहा कि न्यायपालिका के समानांतर एक “सरकारी डिफेंस विंग” तैयार किया जा रहा है, जिससे स्वतंत्र अधिवक्ता व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
LADC विफल या सफल- LADC विफल रहा ऐसा कहना उचित नहीं होगा। कई जिलों में LADC अधिवक्ताओं ने उत्कृष्ट कार्य किया। हजारों विचाराधीन कैदियों को समय पर जमानत मिली, मुकदमों की नियमित पैरवी हुई और विधिक सहायता की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिला। समस्या योजना के उद्देश्य में नहीं थी, बल्कि उसके क्रियान्वयन में थी। जब किसी योजना से बार का बड़ा वर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे, तब उस योजना की संरचना पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
NALSA का नया निर्णय- 4 अगस्त 2026 के पत्र में दो महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं-
पहली, वर्तमान LADC अनुबंधों का नवीनीकरण नहीं होगा।
दूसरी, संबंधित जिला न्यायाधीशों को निर्देश दिया गया है कि विधिक सहायता के मुकदमे पुनः बार के अधिवक्ताओं, विशेषकर युवा वकीलों, को दिए जाएँ।
इसका अर्थ स्पष्ट है कि NALSA फिलहाल वेतनभोगी LADC मॉडल से पीछे हट रही है और पारंपरिक बार-आधारित विधिक सहायता प्रणाली की ओर लौट रही है। साथ ही NALSA ने यह भी स्वीकार किया है कि योजना की कमियों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की गई है। इससे स्पष्ट है कि संस्था योजना को बिना समीक्षा के समाप्त नहीं करना चाहती, बल्कि अधिक प्रभावी मॉडल तलाश रही है।
निर्णय का मूल्याङ्कन – एक एडवोकेट के रूप में मेरा मानना है कि किसी भीयोजना का मूल्यांकन उसके उद्देश्य से अधिक उसके परिणामों के आधार पर होना चाहिए। LADC ने अनेक जरूरतमंद बंदियों को प्रभावी कानूनी सहायता उपलब्ध कराई, परंतु इसके साथ ही स्वतंत्र बार, युवा अधिवक्ताओं के अवसर और पारंपरिक विधिक सहायता व्यवस्था से जुड़े अनेक प्रश्न भी सामने आए।
अब समय आ गया है कि ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिसमें गरीब व्यक्ति का न्याय का अधिकार भी सुरक्षित रहे और स्वतंत्र अधिवक्ताओं के लिए समान अवसर भी सुनिश्चित हों। यह निर्णय एक संतुलित और व्यावहारिक कदम है। यदि किसी योजना का उद्देश्य उत्कृष्ट हो, किंतु उसका संचालन व्यापक असंतोष उत्पन्न करे, तो सुधार आवश्यक हो जाता है।
स्वतंत्र बार भारतीय न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि विधिक सहायता के अवसर कुछ सीमित व्यक्तियों तक सिमट जाएँ, तो इससे युवा अधिवक्ताओं के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए केवल LADC समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा; उसके स्थान पर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें-
• प्रत्येक पात्र अधिवक्ता को समान अवसर मिले।
• गुणवत्ता के स्पष्ट मानक निर्धारित हों।
• कार्य का नियमित मूल्यांकन हो।
• तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था विकसित की जाए।
• गरीब अभियुक्तों के हित सर्वोपरि रहें।
भविष्य- NALSA के इस निर्णय को अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। संभव है कि भविष्य में ऐसा नया मॉडल सामने आए जिसमें LADC की सकारात्मक विशेषताएँ भी बनी रहें और स्वतंत्र बार की भूमिका भी सुरक्षित रहे। यदि ऐसा संतुलन स्थापित किया जाता है, तो यह भारतीय विधिक सहायता व्यवस्था को और अधिक मजबूत बना सकता है।
निष्कर्ष- किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में योजनाएँ स्थायी नहीं होतीं; उनकी उपयोगिता और प्रभावशीलता के आधार पर उनका मूल्यांकन होता है। LADC प्रणाली ने भारतीय विधिक सहायता व्यवस्था को नई दिशा देने का प्रयास किया। उससे अनेक सकारात्मक अनुभव भी मिले, परंतु उसके संचालन से उत्पन्न चुनौतियों ने यह संकेत दिया कि सुधार आवश्यक है।
4 अगस्त 2026 का NALSA का निर्णय इसी सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है। अब यह देखना होगा कि भविष्य में ऐसी कौन-सी व्यवस्था विकसित होती है जो संविधान के अनुच्छेद 39(क) की भावना, स्वतंत्र अधिवक्ता समुदाय के अधिकारों तथा गरीब नागरिकों के न्याय के अधिकार, इन तीनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
लेखक –
(डॉ.) अरविन्द कुमार श्रीवास्तव, एडवोकेट
पूर्व LADC जिला विधिक सेवा प्राधिकरण हरिद्वार,
लेखक – हाँ ! मैं विवादित हूँ, मैं निर्भय हूँ !, AM I NIRBHAYA !, दंगे (MASSECRE OF HINDUS ), अग्निपरीक्षा (तेजाब या हथियार)

