साई शिव मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पर उठे सवाल साधु संतों में मतभेद साई बड़ा या शिव बडा इसको लेकर उठा विवाद

एक और जहां पर कुछ वर्ष पहले अखाड़े के बड़े संतों के द्वारा साई को भगवान मान्ने और मंदिर में अन्य भगवान की मूर्ति स्थापित करने पर ही संतो द्वारा विरोध किया गया था वही संत अब किस आधार पर साई मंदिर मे प्राण प्रतिष्ठा में क्यों पहुंचे यह एक बड़ा सवाल जिसको लेकर सोशल मीडिया पर बड़े संतो को ट्रोल किया जा रहा है

हरिद्वार मैं एक मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा में पहुंचे संतों के सामने भगवान शिव जी का अपमान

एक और जहां पर साधु संत संस्कृति और सनातन को बचाने का काम करते हैं वहीं पर साधु संतों के मंदिर में मौजूद होने पर भी किसी भी संत के द्वारा भगवान शिव जी का शिवलिंग साई बाबा की मूर्ति से छोटा शिवलिंग बनाकर हमारे सनातन को बदनाम करने की साजिश की जा रही है और हम सब वहां पर बैठकर भगवान शिव का अपमान होते देख रहे है यह हमारे साधु संतों को दिखाई नहीं दे रहा है जिस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठान साई शिव गंगा मंदिर के नाम से है जिसमें हरिद्वार के कुछ संतो और सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा विरोध दर्ज भी कराया गया बाबा योगी के द्वारा बताया गया कि हमें साई शिव गंगा नाम से आपत्ति है क्योंकि साई भगवान शिव से बड़ा नहीं हो सकते और उसमें हमारे देवी देवताओं की छोटी मूर्ति बनाई गई है और साई की बड़ी मूर्ति बनाकर रखी गई है जो कि हमारे धर्म के अनुसार नहीं है हमारे संत जो हिंदू धर्म के बड़े ठेकेदार बनते ही समाज को दिशा देते हैं और संतो के द्वारा बताया गया है कि साई कोई भगवान नहीं होते हैं और उन्हें ही संतो के सामने हमारे भगवान की मूर्ति छोटी और साई की बड़ी मूर्ति लगी हुई है उनको भी इस और ध्यान देना चाहिए कि यह सही है या गलत है यदि गलत है तो उसका विरोध होना चाहिए आखिरकार भगवान शिव की नगरी है और भगवान शिव का ही अपमान होगा तो यह हिंदू समाज का तभी बर्दाश्त नहीं करेगा
द्वारका-शारदा पीठ के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी ने शिरडी के साईं बाबा को भगवान मानने पर भी किया था कड़ा विरोध

द्वारका-शारदा पीठ के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी ने शिरडी के साईं बाबा को भगवान मानने या मंदिरों में उनकी मूर्तियां स्थापित करने के खिलाफ एक बड़ा वैचारिक और धार्मिक अभियान चलाया था。उनके इस अभियान और इससे जुड़े घटनाक्रम के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:साईं बाबा को देवता मानने का विरोध: शंकराचार्य जी का स्पष्ट मत था कि साईं बाबा एक फकीर थे, ईश्वर नहीं。 उन्होंने अपने धर्मादेश में यह निर्देश दिया था कि सनातन धर्म को मानने वाले हिंदुओं को साईं बाबा की पूजा देवताओं की तरह नहीं करनी चाहिए。मूर्तियों के हटाने की अपील: उन्होंने यह भी आह्वान किया था कि हिंदू मंदिरों में अन्य देवी-देवताओं के साथ साईं बाबा की मूर्ति नहीं रखी जानी चाहिए और इसे हटाया जाना चाहिए。कानूनी और सामाजिक विवाद: इस बयान के बाद देश भर में भारी विवाद छिड़ गया था साईं भक्तों की संस्थाओं ने इसका कड़ा विरोध किया और कुछ मामलों में अदालत का रुख भी किया。वर्तमान स्थिति: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी सितंबर 2022 में ब्रह्मलीन हो चुके हैं。 वर्तमान में यह पूरा विवाद अब काफी हद तक शांत हो चुका है और भक्तगण अपनी आस्था के अनुसार शिरडी में दर्शन करते है
जगतगुरु शंकराचार्य और शिरडी साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट के बीच का यह विवाद मुख्य रूप से सनातन धर्म की मान्यताओं और पूजा पद्धतियों से जुड़ा हुआ है। द्वारका पीठ के दिवंगत शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने साईं बाबा ट्रस्ट और उनकी पूजा के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया था。शंकराचार्य का विरोध क्यों है?देवत्व का प्रश्न: शंकराचार्य का स्पष्ट मत था कि 19वीं सदी के संत शिरडी साईं बाबा को हिंदू शास्त्रों और धर्म संसद में भगवान या गुरु का दर्जा नहीं दिया गया है。पूजा पद्धति पर आपत्ति: उनका तर्क था कि हिंदू धर्म में केवल उन्हीं देवी-देवताओं की मूर्ति पूजा और प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, जिनका शास्त्रों में उल्लेख है。धार्मिक अलगाव का आरोप: शंकराचार्य का मानना था कि साईं बाबा का “सबका मालिक एक” का दृष्टिकोण हिंदू धर्म को बांटने की एक साजिश है。विवाद के मुख्य बिंदुधर्म संसद का प्रस्ताव: वर्ष 2014 में छत्तीसगढ़ के कवर्धा में आयोजित एक धर्म संसद में संतों ने प्रस्ताव पारित कर साईं बाबा को न तो भगवान और न ही गुरु घोषित किया था。कानूनी विवाद: शंकराचार्य द्वारा साईं बाबा के खिलाफ की गई टिप्पणियों के बाद, मुंबई के एक ‘साईंधाम चैरिटेबल ट्रस्ट’ ने इस बयानबाजी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था。श्रद्धालुओं की आस्था: दूसरी ओर, साईं बाबा के भक्तों की आस्था इन बयानों से अप्रभावित रही है。 शिरडी स्थित श्री साई बाबा संस्थान ट्रस्ट देश भर के भक्तों के लिए एक प्रमुख आस्था का केंद्र है।आगे क्या हुआ?दिग्गज शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद, उनके उत्तराधिकारी (जैसे ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती) अक्सर विभिन्न मंदिरों के ट्रस्टों के प्रबंधन, और चढ़ावे में पारदर्शिता को लेकर अपनी आवाज उठाते रहे हैं。 हालांकि, साईं बाबा को भगवान मानने या न मानने को लेकर शुरू हुआ यह विवाद एक धार्मिक बहस के रूप में अब भी बना हुआ है।

साई मंदिर में क्यों नहीं रखते भगवान की मूर्ति

सनातन धर्म (Hindu Dharma) में साईं बाबा को सद्गुरु और भक्त के रूप में मान्यता प्राप्त है। किसी भी साईं मंदिर (Sai Baba Temple) के गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) में शिव, विष्णु या अन्य देवों के साथ शिवलिंग या अन्य देवताओं की मूर्तियां स्थापित करना शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता है।मुख्य कारण:आसन और स्थान का अंतर: शास्त्रों में ‘गुरु’ का स्थान और ‘ईश्वर’ (शिवलिंग/मूर्ति) का स्थान अलग माना जाता है। गर्भगृह में मुख्य स्थान ईश्वर का होता है।पूजा पद्धतियां (Puja Vidhi): सनातन धर्म में शिव, राम, कृष्ण आदि के विग्रहों (मूर्तियों) और शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा, उनके भोग, और दैनिक पूजन विधि (जैसे जलाभिषेक) के नियम अलग हैं। साईं बाबा के मंदिर में सर्वधर्म समभाव की मान्यता होती है, जिससे परंपराओं में विरोधाभास आ सकता है।परंपराओं का टकराव: बहुत से संत और धर्माचार्य साईं बाबा को ईश्वर नहीं बल्कि ‘गुरु’ मानते हैं। इसलिए, देवस्थान पर गुरु और भगवान को एक समान रखने पर धार्मिक मतभेद हो सकते हैं।व्यावहारिक विकल्प:आप मंदिर के अलग कक्ष (hall) या आंगन में अन्य देवी-देवताओं की स्थापना कर सकते हैं, लेकिन मुख्य गर्भगृह और वेदी को इन नियमों से मुक्त रखना ही उचित है।क्या आप इस विषय पर किसी विशेष मंदिर की व्यवस्था या धार्मिक मान्यता के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं /

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