📜 विशेष विश्लेषण | उक्रांद का इतिहास और वर्तमान
31 वर्ष पहले भी जुलाई में उक्रांद के दो भाग हुए थे – उक्रांद-पी (पंवार) और उक्रांद-डी (डंगवाल/दिवाकर)
उक्रांद-पी अध्यक्ष और पदों की राजनीति में उलझ कर रह गया, जबकि उक्रांद-डी ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन को पुनः जीवित करके 19-20 जनवरी 1996 को भारत सरकार के साथ उत्तराखंड राज्य घोषणा की बैठक कराने में सफलता प्राप्त की।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्र 30 वर्ष बाद उसी स्थान पर होते हैं व इतिहास अपने को दोहराता है – ठीक 30 वर्ष बीत गए हैं, उक्रांद दो भागों में विभाजित हो रहा है। हो सकता है कि उक्रांद राजनीतिक स्वार्थ के व्यूह में फंस कर विधानसभा से दूर हो जाय और उक्रांद-डी विधानसभा में प्रवेश कर जाय। यह सिर्फ एक आकलन है, गलत या सही हो सकता है।
समाधान क्या?
यदि उक्रांद को विधानसभा चुनाव में सफलता प्राप्त करनी है तो संगठन पुनर्गठित करना होगा, जिसमें वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का सम्मान करते हुए युवाओं को स्थान देना होगा।
- उक्रांद शुभाकांक्षी व उत्तराखंड राज्य आंदोलन व निर्माण बैठक के भागीदार – रवींद्र वशिष्ठ

