ऐसे हरिद्वार के डिवाइडर बदले जा रहे हैं जिनकी आवश्यकता नहीं थी डिवाइडर बदलवाने की क्या जरूरत है क्या कुम्भ डिवाइडर से होगा
डाम कोठी मायापुर से लेकर शंकराचार्य चौक तक पहले हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण ने पैसे खर्च किए अब कुम्भ के बजट से पैसे खर्च हो रही है कीमती पेड़ लगाए गए थे दीवारे बनाई गई थी अब दोबारा दीवारें बनाई जा रही है यह सब क्या है कुंभ के नाम का पैसे का बंदर बाट हो भैया कोई भी अधिकारी नेता सुनने को तैयार नहीं है जनता अस्त्र है अधिकारी मस्त है
अलकनंदा घाट vs ओम घाट – पत्थर बता रहा है भ्रष्टाचार की कहानी
दोस्तों, नीचे तीन फोटो देखिए। पहली और दूसरी अलकनंदा घाट की है, तीसरी अलकनंदा से सटे ओम घाट की।
अलकनंदा घाट पर जो लाल पत्थर लगा है, वो कुंभ मेला 2021 में, यानी सिर्फ 4 साल पहले लगा था। और आज वही पत्थर उखाड़ कर नया लगाया जा रहा है।
वहीं बगल में ओम घाट पर लगा पत्थर लगभग 10 साल पुराना है, जो उत्तर प्रदेश सरकार ने लगवाया था। वो आज भी जस का तस है, अगले 10 साल भी उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
हैरानी देखिए, यही लाल पत्थर दिल्ली के लाल किले में भी लगा है, सैकड़ों साल से लगा है और आज तक वैसा का वैसा है, अगले सैकड़ों साल भी कुछ नहीं बिगड़ेगा।
तो फिर हरिद्वार में ही 4 साल में ये पत्थर बदलने लायक कैसे हो जाता है?
और यही खेल अब सुभाष घाट, हर की पैड़ी और सभी घाटों पर होगा। जबकि पत्थर इसीलिए लगाया जाता है कि अगर एकाध टूट जाए तो वही बदला जाए, गंदा हो तो घिसाई हो जाए। शायद उत्तराखंड सरकार और मेले में लगे अधिकारियों को ये बात पता ही नहीं है।
दोष सिर्फ सरकार या अधिकारियों को देना काफी नहीं है। असली सवाल हमसे है – क्या हमने अपने शहर से प्यार किया है? अपनी जिम्मेदारी समझी है?
हमारी आंखों के सामने खुलेआम भ्रष्टाचार हो रहा है और हम मुंह मोड़ रहे हैं। क्या इसी विकास के लिए तरस रहे थे हम?
तीन-तीन कैबिनेट मंत्री, ट्रिपल इंजन की सरकार और भ्रष्टाचार की भरमार। लानत है।
मां गंगा के तट पर बसे इस शहर ने हमें बहुत कुछ दिया है, पर क्या हम शहर को कुछ दे पाए हैं?
अगर जिंदा हो तो अपनी अंतरात्मा से ये सवाल जरूर पूछना – हमारी अंतरात्मा बची भी है या नहीं? हम कब अपने शहर के लिए अधिकारियों से सवाल-जवाब करेंगे? क्या विरासत हम अपने बच्चों के लिए छोड़ कर जाएंगे?

