मातृ सदन, हरिद्वार
ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद जी के अविछिन्न अनशन/सत्याग्रह का चौथे दिन।

मातृ सदन के संत ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद जी का अविछिन्न अनशन/सत्याग्रह अब चौथे दिन में प्रवेश कर चुका है। उनकी माँग सीधी व स्पष्ट हैं: एक जज जिनकी ईमानदारी पर हर तरफ से गंभीर सवाल उठते रहे हैं, उन्होंने कर्तव्यच्युत होकर, मातृ सदन जैसी पवित्र संस्था के बारे में बेतरतीब, अपने पद की गरिमा के विपरीत जाकर व्यक्तिगत द्वेष से भरी टिप्पणियाँ की हैं और उन्हें एक न्यायिक रिकार्ड का हिस्सा बनाया है, जिसके लिए उन्हें तत्काल रूप से निलंबित किया जाना चाहिए व लिखित रूप में मातृ सदन से माफी माँगनी चाहिए। श्री नरेंद्र दत्त का सर्विस रिकॉर्ड, ईमानदारी और न्याय की भावना, सब पर गंभीर सवालिया निशान हैं। महत्वपूर्ण तथ्य है कि माननीय उच्च न्यायालय – जो आमतौर पर अपने न्यायिक अधिकारियों को शर्मिंदा नहीं करता, खासकर जहाँ क्षमा याचना करने पर किसी मुद्दे को माफ किया जा सकता हो – ने श्री नरेंद्र दत्त के व्यवहार और कार्यशैली की कठोर आलोचना करते हुए कोई कसर नहीं छोड़ी। माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में श्री नरेंद्र दत्त के काम करने के पूरे तरीके की विवेचना की है, जिससे उनके व्यवहार के विषय में पता चलता है कि वे न्याय के लिए नहीं, बल्कि, जैसा कि उनकी कार्यशैली से स्पष्ट परिलक्षित होता है, अपना व्यक्तिगत द्वेष कई न्यायिक मामलों में प्रकट किया है, जिसके अनेक प्रमाण मातृ सदन द्वारा लगातार साझा किए जा रहे हैं । “रेखा रघुवंशी” मामले में माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि श्री नरेंद्र दत्त का आचरण एक न्यायिक अधिकारी के पद की मर्यादा के सर्वथा प्रतिकूल है, इसलिए माननीय उच्च न्यायालय ने अपने इस आदेश को उनके सर्विस रिकार्ड में दर्ज करने के आदेश भी पारित किए और उन्हें चेतावनी दी कि दुबारा इस प्रकार के क्रियालापों में संलिप्त न हो। श्री नरेंद्र दत्त ने माननीय हाई कोर्ट के इस फैसले को माननीय उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन उन्हें वहाँ से कोई राहत नहीं मिली। इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश की कॉपी भी साझा की जा रही है। “धनंजय चतुर्वेदी” मामले में भी माननीय उच्च न्यायालय ने ऐसा ही रुख अपनाया। आदेश से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि श्री नरेंद्र दत्त अपने सहकर्मी न्यायाधीश श्री धनंजय चतुर्वेदी को नीचा दिखाने और सीनियरिटी के झगड़े में फंसकर ज्यूडिशियरी को शर्मिंदा करने से भी नहीं हिचकिचाए और अपने सहकर्मी न्यायाधीश श्री धनंजय चतुर्वेदी को गिराने के लिए खुद बहुत नीचे गिर गए। स्पष्ट कर दें कि यहाँ जो कुछ भी इंगित किया जा रहा है, वो माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों में वर्णित तथ्यों के आधार पर ही किया जा रहा है । माननीय उच्च न्यायालय के फैसलों और उनके व्यवहार के बारे में पब्लिक फीडबैक से कोई शक नहीं रह जाता कि वे डिस्ट्रिक्ट जज जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौपें जाने के योग्य नहीं हैं, क्योंकि उनके क्रियाकलापों से यह स्पष्ट है कि उनका इरादा न्याय के सिद्धांतों पर काम करने का नहीं, बल्कि भेदभाव वाली पहले से तय सोच पर आधारित है।
6 दिसंबर, 2016 को खबर प्रकाशित हुई कि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गलत काम के दोषी पाए गए तीन जजों को सस्पेंड करने का आदेश दिया है। एक गुमनाम शिकायत की जांच उत्तराखंड हाई कोर्ट के तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल श्री नरेंद्र दत्त ने की थी। उनकी जांच के बाद, लेबर कोर्ट हल्द्वानी की प्रेसाइडिंग ऑफिसर नीतू जोशी; उत्तराखंड ज्यूडिशियल एंड लीगल एकेडमी (UJALA), भवाली के जॉइंट डायरेक्टर प्रदीप कुमार मणि; और ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट हल्द्वानी दुर्गा को सस्पेंड कर दिया गया। परंतु श्री नरेंद्र दत्त के समस्त कार्यकाल को यदि एक साथ देखा जाए, तो उक्त कार्यवाही गंभीर संदेह के घेरे में हैं। मातृ सदन की मांग है कि श्री नरेंद्र दत्त द्वारा ऐसे पदों पर रहते हुए की गई इन और दूसरी सभी जांच रिपोर्टों को सार्वजनिक किया जाए क्यूंकि श्री नरेंद्र दत्त का नाम अक्सर कई “गुमनाम शिकायतों” से जुड़े रहे हैं। “धनंजय चतुर्वेदी” मामले में भी कार्यवाही एक गुमनाम शिकायत के आधार पर ही की गई थी, क्यूंकि जिन व्यक्ति के नाम से श्री धनंजय चतुर्वेदी के विरुद्ध माननीय उच्च न्यायालय में शिकायत प्राप्त हुई, जाँचोपरांत उन व्यक्ति के वास्तविकता में होने का कोई प्रमाण नहीं पाया गया । यहां यह बताना ज़रूरी है कि जबसे श्री नरेंद्र दत्त ने मातृ सदन के विरुद्ध गंभीर टिप्पणियों वाला एक न्यायिक आदेश लिखते हुए दो ऐसे व्यक्तियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की है, जो व्यक्ति किसी भी रूप से मातृ सदन से जुड़े नहीं हैं, तब से मातृ सदन को अलग-अलग जगहों से कई फोन/मैसेज प्राप्त हुए हैं, जिनमें सभी ने एक आवाज़ में कहा है कि श्री नरेंद्र दत्त ने अपने समस्त कार्यकाल में अपने गहरे भेदभाव में काम करते हुए ज्यूडिशियल अधिकारियों सहित कई लोगों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी है।
श्री नरेंद्र दत्त, जिन्होनें मातृ सदन के विरुद्ध अपने व्यक्तिगत द्वेष को व्यक्त करते हुए अपने द्वारा लगाए गए बेबुनियाद आरोपों का जवाब देने का मौका दिए बिना एक ऑर्डर लिखवाया, जिसमें उन्होनें बिना किसी आधार के मातृ सदन के विरुद्ध अनर्गल, बेबुनियाद और न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन करने वाली टिप्पणियाँ की — संस्था के संतों की निष्ठा पर बिना किसी औचित्य के सवाल खड़े किए, जो एक मौकापरस्त सोच के अलावा और कुछ नहीं है, और स्पष्ट कर दिया कि वे सच जानने के इच्छुक नहीं है। उन्होनें उन्हें न संबोधित हुए पत्रों को अपने आदेश में रिकार्ड किया, संस्था पर ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर आरोप लगाए और एक आपराधिक मामले की जांच को पूर्णतः प्रभावित करने वाली टिप्पणियाँ की । ज्यूडिशियरी आम आदमी की आखिरी पनाह और उम्मीद है; श्री नरेंद्र दत्त के क्रियाकलापों ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जिला जज हरिद्वार के पद पर उनकी नियुक्ति पहुँच, कॉन्टैक्ट्स और कनेक्शन्स पर निर्भर है, न कि बेदाग ईमानदारी पर जो एक जज की सबसे बड़ी पहचान होनी चाहिए? इसका स्पष्टीकरण उन्हें देना होगा।
मातृ सदन में सत्याग्रह जारी है। उक्त मांगें स्पष्ट व सीधी हैं – श्री नरेंद्र दत्त का निलंबन व लिखित में मातृ सदन से माफी । जबतक इन मांगों पर कार्यवाही नहीं होती, तब तक सत्य के लिए, न्यायिक मर्यादा के लिए और न्यायपालिका की चेतनता को बचाए रखने के लिए यह आंदोलन जारी रहेगा ।

