विजयदशमी के शुभ अवसर पर रावण जैसे महान विद्वान का पुतला दहन नहीं करना चाहिए

॥ धर्मो रक्षति रक्षितः ॥
“जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।”

विजयादशमी का वास्तविक अर्थ
शस्त्र-पूजन, ज्ञान और धर्म-विजय का पर्व, न कि रावण-दहन का उत्सव

बहुत लोग नहीं जानते कि रावण-दहन कोई प्राचीन सनातन परंपरा नहीं है, यह 1948 में सिंध से आए लोगों द्वारा शुरू की गई कुप्रथा है। रावण महान विद्वान, शिवभक्त और परम ज्ञानी था – ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने से उसके वध के बाद श्री राम पर भी ब्रह्म हत्या का पाप लगा था।

आइए, इस विजयादशमी पर रावण-दहन नहीं, बल्कि शस्त्र-पूजन, ज्ञान, विवेक और धर्म-विजय का संकल्प लें।

यही इस पावन पर्व का वास्तविक, सनातन और शाश्वत संदेश

रावण दहन क्यों रुकना चाहिए?

1. रावण केवल खलनायक नहीं, महा-विद्वान था
रावण चारों वेदों, ज्योतिष, आयुर्वेद, तंत्र और संगीत का प्रकांड पंडित था। उसने शिव तांडव स्तोत्र जैसे महान ग्रंथों की रचना की। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। एक इतने बड़े ज्ञानी का अपमान करके पुतला जलाना, ज्ञान का अपमान है।

2. यह कोई प्राचीन सनातन परंपरा नहीं है
जैसा कि हमारे पोस्टर में भी बताया गया है, इतिहासकारों के अनुसार रावण दहन का उत्सव 1948 के बाद सिंध क्षेत्र से आए लोगों द्वारा शुरू किया गया था। वाल्मीकि रामायण या किसी भी प्राचीन धर्मशास्त्र में रावण के पुतले को हर साल जलाने का कोई उल्लेख नहीं है। विजयादशमी का वास्तविक अर्थ शस्त्र-पूजन, शमी वृक्ष पूजन और अपराजिता देवी की आराधना है।

3. ब्रह्म हत्या का पाप
रावण ब्राह्मण कुल में उत्पन्न पुलस्त्य ऋषि का पौत्र था। धर्मशास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण की हत्या महापाप है। स्वयं भगवान श्री राम को भी रावण वध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए प्रायश्चित करना पड़ा था। फिर हम हर साल अनजाने में उसी पाप के भागी क्यों बनें?

4. हम क्या संदेश दे रहे हैं?
हम हर साल रावण को जलाकर सोचते हैं कि हमने बुराई पर जीत पा ली, जबकि असली बुराई – अहंकार, क्रोध, लोभ – हमारे भीतर ही है। प्रतीकात्मक पुतला जलाने से अच्छा है कि हम अपने अंदर के दुर्गुणों को जलाएं

रावण दहन क्यों रुकना चाहिए?

1. रावण केवल खलनायक नहीं, महा-विद्वान था
रावण चारों वेदों, ज्योतिष, आयुर्वेद, तंत्र और संगीत का प्रकांड पंडित था। उसने शिव तांडव स्तोत्र जैसे महान ग्रंथों की रचना की। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। एक इतने बड़े ज्ञानी का अपमान करके पुतला जलाना, ज्ञान का अपमान है।

2. यह कोई प्राचीन सनातन परंपरा नहीं है
जैसा कि हमारे पोस्टर में भी बताया गया है, इतिहासकारों के अनुसार रावण दहन का उत्सव 1948 के बाद सिंध क्षेत्र से आए लोगों द्वारा शुरू किया गया था। वाल्मीकि रामायण या किसी भी प्राचीन धर्मशास्त्र में रावण के पुतले को हर साल जलाने का कोई उल्लेख नहीं है। विजयादशमी का वास्तविक अर्थ शस्त्र-पूजन, शमी वृक्ष पूजन और अपराजिता देवी की आराधना है।

3. ब्रह्म हत्या का पाप
रावण ब्राह्मण कुल में उत्पन्न पुलस्त्य ऋषि का पौत्र था। धर्मशास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण की हत्या महापाप है। स्वयं भगवान श्री राम को भी रावण वध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए प्रायश्चित करना पड़ा था। फिर हम हर साल अनजाने में उसी पाप के भागी क्यों बनें?

4. हम क्या संदेश दे रहे हैं?
हम हर साल रावण को जलाकर सोचते हैं कि हमने बुराई पर जीत पा ली, जबकि असली बुराई – अहंकार, क्रोध, लोभ – हमारे भीतर ही है। प्रतीकात्मक पुतला जलाने से अच्छा है कि हम अपने अंदर के दुर्गुणों को जलाएं।

सही परंपरा क्या हो?
विजयादशमी पर रावण दहन नहीं, बल्कि:

  • शस्त्र-पूजन करें
  • विद्या आरंभ करें
  • अपने ज्ञान और विवेक को जगाएं

धर्मो रक्षति रक्षितः।

रावण दहन रोकना धर्म का अपमान नहीं, बल्कि सनातन धर्म के वास्तविक स्वरूप की ओर वापसी है।

विजयादशमी पर रावण दहन नहीं, बल्कि:

  • शस्त्र-पूजन करें
  • विद्या आरंभ करें
  • अपने ज्ञान और विवेक को जगाएं

धर्मो रक्षति रक्षितः।

रावण दहन रोकना धर्म का अपमान नहीं, बल्कि सनातन धर्म के वास्तविक स्वरूप की ओर वापसी है।

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