गुरु पूर्णिमा पर हरिद्वार मे उमड़ा आस्था का जन सैलाब भक्तों ने दिखाया गुरु के प्रति आस्था और विश्वास की भक्ति.

अखंड परमधाम आश्रम में भक्तों ने युग पुरुष स्वामी परमानंद गिरि जी का पूजन कर लिया आशीर्वाद हजारों की संख्या में भक्तों ने अपने गुरु परंपरा के तहत गुरु पूर्णिमा मनाई स्वामी जी द्वारा बताया गया क़ी गुरु परंपरा किस तरह मनानी चाहिए और गुरु पूर्णिमा का क्या अर्थ है

जय गुरुदेव” के जयघोष से गूंजे आश्रम, गुरु चरणों में उमड़ा आस्था, भक्ति और समर्पण का अनुपम संगम

श्री अखंड परम धाम आश्रम के स्वामी परमानंद गिरि जी के कृपा पात्र शिष्य महामडलेश्वर स्वामी ज्योतिर्मानंद सरस्वती ने गुरु पूर्णिमा पर सभी को शुभकामनाएं बधाई दी उन्होंने बताया कि गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु शिष्य की अद्भुत अलौकिक भक्ति का एक उदाहरण है आदिकाल से चल रही गुरु पूर्णिमा गुरु के द्वारा शिक्षय क्या ज्ञान तो को दूर करने का एक अनोखा पर्व है


धर्म की राजधानी हरिद्वार में गुरु पूर्णिमा पर उमड़ा श्रद्धा का महासागर


“जय गुरुदेव” के जयघोष से गूंजे आश्रम, गुरु चरणों में उमड़ा आस्था, भक्ति और समर्पण का अनुपम संगम


गुरु कृपा पाने को घंटों प्रतीक्षा करते रहे हजारों शिष्य, भाव-विभोर होकर किया चरण पूजन

हरिद्वार, गुरु पूर्णिमा। धर्म की राजधानी एवं विश्वविख्यात तीर्थ नगरी हरिद्वार में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व श्रद्धा, समर्पण और सनातन परंपरा के दिव्य वातावरण में मनाया गया। प्रातःकाल से ही शहर के सभी प्रमुख मठों, मंदिरों, आश्रमों एवं अखाड़ों में श्रद्धालुओं और शिष्यों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। हर ओर एक ही स्वर गूंज रहा था—“जय गुरुदेव… जय गुरुदेव…”

गुरु के दर्शन और पूजन के लिए श्रद्धालु घंटों अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहे। जब उनकी बारी आई तो वैदिक मंत्रों के पवित्र उच्चारण के बीच गुरु के चरणों का पूजन, तिलक, पुष्प, वस्त्र और दक्षिणा अर्पित कर दण्डवत प्रणाम किया तथा जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त किया।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थ : गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही भगवान महेश हैं। गुरु ही साक्षात् परमब्रह्म हैं, ऐसे श्रीगुरुदेव को बार-बार प्रणाम।

परमार्थ आश्रम भूपतवाला में साध्वी अन्या सरस्वती जी के द्वारा गुरु पूर्णिमा पर्व धूमधाम से मनाया गया उनके द्वारा अपने गुरु की पूजा कर उनसे आशीर्वाद लिया


 

श्री निरंजनी अखाड़े में उमड़ा हजारों शिष्यों का सैलाब

श्री निरंजनी अखाड़े में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्र पुरी महाराज के हजारों शिष्य गुरु पूजन के लिए कतारों में खड़े रहे। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धापूर्वक चरण पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। पूरे परिसर में भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत वातावरण बना रहा।


 
गीता कुटीर तपोवन में समाधि पूजन का भावपूर्ण दृश्य

गीता कुटीर तपोवन में स्वामी गीतानंद जी महाराज की समाधि पर संतों एवं भक्तों ने पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और गुरु चरणों में नमन कर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया।


 
हरमिलापी परंपरा में गुरु भक्ति का अनुपम दर्शन

हरनीला भवन में श्रद्धालुओं ने गुरु मदन मोहन हरमिलापी महाराज का अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजन किया। पूरा वातावरण भजन, कीर्तन और गुरु वंदना से गुंजायमान रहा।


 
भारत माता मंदिर में गुरु परंपरा को नमन

भारत माता मंदिर के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज की समाधि पर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराजमहामंडलेश्वर स्वामी ललितानंद गिरिआई.डी. शास्त्री तथा अन्य संतों एवं भक्तों ने श्रद्धापूर्वक पुष्पांजलि अर्पित कर गुरु को नमन किया।


 हर आश्रम में दिखी गुरु भक्ति की अलौकिक छटा

भूमि निकेतन में स्वामी अच्युतानंद तीर्थ जी महाराज का पूजन भक्तों ने श्रद्धापूर्वक किया।

जयराम आश्रम में स्वामी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी महाराज ने अपने गुरु का अत्यंत भावपूर्ण पूजन किया।

जगन्नाथ धाम में स्वामी अरुण दास महाराज ने गुरु पूजन के उपरांत शिष्यों को आशीर्वाद प्रदान किया।

वैष्णव भवन में स्वामी दुर्गादास जी महाराज ने अपने गुरु का पूजन किया, वहीं उनके भक्तों ने भी स्वामी जी का श्रद्धा एवं वैदिक विधि-विधान से पूजन किया।


 जब छलक पड़े श्रद्धालुओं की आंखों से आंसू…

गुरु के दर्शन करते ही अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। कोई गुरु के चरणों में सिर रखकर रो पड़ा, तो कोई हाथ जोड़कर प्रार्थना करता रहा—

“गुरुदेव! अपनी कृपा-दृष्टि जीवन भर बनाए रखिए। हमारे परिवार में सुख, शांति, आरोग्य, समृद्धि और धर्म की ज्योति सदैव जलती रहे।”

वह दृश्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के अमर संबंध का जीवंत प्रमाण बन गया।

दोहा :

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

अर्थ : यदि गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताते हैं।


 गुरु परंपरा ही सनातन संस्कृति की आत्मा है

गुरु पूर्णिमा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि ज्ञान, संस्कार, धर्म और आध्यात्मिक उन्नति का आधार गुरु ही हैं। गुरु के बिना न तो जीवन का अंधकार दूर हो सकता है और न ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

धर्मनगरी हरिद्वार में पूरे दिन चली गुरु पूजा ने यह सिद्ध कर दिया कि सनातन संस्कृति की सबसे मजबूत नींव गुरु-शिष्य परंपरा है, जो आज भी उतनी ही जीवंत, प्रेरणादायी और पवित्र है जितनी हजारों वर्ष पूर्व थी।

“जहाँ गुरु का आशीर्वाद होता है, वहाँ जीवन में ज्ञान का प्रकाश, मन में शांति और कर्म में सफलता स्वतः प्राप्त होती है।”

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