राजनीति का खेल बड़ा ही अनोखा है। ऊपर चढ़ते वक्त जितनी चतुराई चाहिए, उतनी ही नीचे न गिरने की कला भी। राजनाथ सिंह इस खेल को शायद सबसे शांति से, सबसे चुपके से खेलते आए हैं।

बीजेपी में सबसे बड़ा नाम और कभी विवादों में भी नहीं रहे सिर्फ अपने काम पर फोकस किया

राजनीति का खेल बड़ा ही अनोखा है। ऊपर चढ़ते वक्त जितनी चतुराई चाहिए, उतनी ही नीचे न गिरने की कला भी। राजनाथ सिंह इस खेल को शायद सबसे शांति से, सबसे चुपके से खेलते आए हैं।

उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, तीन बार पार्टी अध्यक्ष, गृह मंत्री और अब रक्षा मंत्री—हर सीढ़ी पर वो बिना शोर मचाए, बिना किसी से टकराए चढ़ते गए। मोदी युग में जब चारों तरफ पुराने और नए चेहरों की कटौती हो रही थी, तब भी राजनाथ सिंह मंत्रिमंडल में टिके रहे। न ज्यादा बोलकर, न कम। बस अपना काम और अपना वजूद बनाए रखा।

अब अगर चर्चा सही साबित हुई और वो राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गए, तो मानना पड़ेगा कि उनकी राजनीतिक यात्रा सचमुच पूर्ण हो गई। प्रधानमंत्री पद व्यावहारिक रूप से सबसे ऊंचा है, मगर संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति का ओहदा सबसे सम्मानजनक। प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री नहीं बन पाए, लेकिन राष्ट्रपति बनकर अपने करियर को एक मुकम्मल अंत दे गए। वहीं अटल बिहारी वाजपेयी के बाद भाजपा के सबसे बड़े चेहरे लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बनने की पूरी ताकत लगाकर भी न बन सके। राष्ट्रपति भी नहीं। चाहे भारत रत्न ही क्यों न मिल गया, उनके राजनीतिक जीवन में वो खालीपन महसूस होता रहा।

दरअसल, मोदी के आने के बाद जो भी पुराने नेता उनके रास्ते में थोड़ा-बहुत अड़ंगा समझे गए—चाहे आडवाणी हों या अन्य वरिष्ठ—उन्हें एक-एक करके किनारे किया गया। कुछ सम्मान के साथ, कुछ बिना सम्मान के। लेकिन राजनाथ सिंह… वो राजनाथ ही निकले। न टकराए, न झुके, न चिल्लाए। बस आगे बढ़ते रहे।

यही उनकी सबसे बड़ी चतुराई है। शोर नहीं मचाना, लेकिन मौका आने पर मौजूद रहना। अगर राष्ट्रपति पद मिला, तो ये उनकी उस शांत लेकिन मजबूत राजनीति की सबसे खूबसूरत तारीफ होगी।

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